वटवृक्ष मत बनो

               हे मानव !
               तुम वटवृक्ष मत बनो,
               नई पौध को भी उगने दो,
               माना कि तुम महान हो,
               सुदृढ़ शक्तिमान हो,
               इसलिए जमकर डटे हो,
               नहीं फटकने देते किसी को,
               इसलिए सदियों तक खड़े हो।
               पूरी जीवन-ऊर्जा अगर तुम ही ले लोगे,
               तो आस-पास के पौधों का क्या होगा?
               मर जायेंगे वे असमय में ही,
               वह भी तुम्हारे कारण ,
               क्योंकि तुम्हारी छाया में,
               कोई पौधा पनप नहीं सकता।
               तुम्हारी महानता इसमें नहीं
               कि तुम किसी को पनपने न दो,
               तुम अगर छाया न भी दो,
               तो कोई अन्य पेड़ छाया देगा,
               किन्तु तुम्हारी तरह,
               जीवन तो नहीं छीनेगा।
               अच्छी तरह सोच लो,
               अन्य पेड़ हैं इसलिए,
               तुम्हारा अस्तित्व महान है।
               लघुता न हो तो गुरुता का महत्व क्या?
               रात न हो तो दिन का अस्तित्व  क्या?
               सबलता अगर किसी के काम न आए?
               तो वह धरती पर बोझ बन जाती है,
               और धरती भी उसके बोझ से,
               मुक्त होना चाहती है।

       ( ’ Be Not a Banyan Tree ’  इस कविता का अनुवाद है)

                डा. रमा द्विवेदी 
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6 Comments

  1. समीर लाल said,

    August 16, 2007 at 4:34 pm

    किस किस क्षेत्र में किस किस को समझाईयेगा, रमा जी.

    हर जगह तो यह बरगदी पहलवान डटे हैं-चाहे साहित्य हो या राजनित या अन्य कोई क्षेत्र.

    काश, आपका अनुवाद उन कानों तक पहुँचे. अच्छा किया, अब तो उनको अंग्रेजी न समझ पाने का बहाना भी नहीं रहा-यह लो हिन्दी में.

    बधाई एवं साधुवाद इस अहम विषय को लाने के लिये.

    स्वयंभू पीठाधीशों एवं मठधीशों, सुन रहे हो??? :)

  2. paramjitbali said,

    August 16, 2007 at 5:21 pm

    बहुत बढिया रचना है। आप ने अच्छा किया जो इसे हिन्दी मे यहाँ प्रेषित किया ।

  3. डा. रमा द्विवेदी said,

    August 16, 2007 at 5:26 pm

    समीर जी,

    क्या क्या लिखे लेखक ….क्या क्या समझाए ? फिर भी वह तो अपना कर्म करता है अब कोई अनाड़ी हो जो समझना ही न चाहे तब हम और आप क्या कर सकते हैं.:)..लेकिन हमें सच लिखना नहीं छोड़ना चाहिए। बहुत अच्छी लगी आपकी बात….हार्दिक आभार…

  4. डा. रमा द्विवेदी said,

    August 16, 2007 at 5:29 pm

    बहुत बहुत शुक्रिया परमजीत जी :)

  5. दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका said,

    August 16, 2007 at 5:33 pm

    अच्छी तरह सोच लो,
    अन्य पेड़ हैं इसलिए,
    तुम्हारा अस्तित्व महान है।

    बहुत बढिया आपने वास्तविकता बयान की है
    दीपक भारतदीप

  6. ramadwivedi said,

    August 19, 2007 at 5:30 pm

    डा. रमा द्विवेदी said…

    दीपक जी,

    आपको कविता पसन्द आई…बस मेरा लिखना सार्थक हो गया..हार्दिक आभार..

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