कुछ मुक्तक
August 26, 2007 at 4:46 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
१- टेस्ट ट्यूब बेबी तो अभी जन्में हैं,
ये बनावटी लोग कहां से आते हैं।
बनावटी चेहरों की नकल करते-करते,
असली चेहरा ही भूल जाते हैं॥२- चेहरे पर सच्चाई का नूर नहीं,
बेईमानी का लबादा है।
झूठ में रात-दिन गुजारते हैं,
पूरा करते नहीं अपना वादा है॥३- क्या हुआ अगर हम आपके अज़ीज़ नहीं,
हम भी इंसान हैं हम दिल के गरीब नहीं।
इंसानियत अभी जिन्दा है,दिल की मरीज़ नहीं,
चलें सब साथ-साथ क्या कोई तरकीब नहीं?४- छोटी सी ज़िन्दगी में झगड़ा है किस बात का?
प्यार से हम सब रहें संकल्प लें इस बात का।
बांट लें सुख-दु:ख सबके जीवन के दिन रात का,
क्यों नहीं जुड़ पाते हम प्रश्न है इस बात का?डा. रमा द्विवेदी
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समीर लाल said,
August 28, 2007 at 2:28 am
वाह, गजब/!!!
तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.
डा. रमा द्विवेदी said,
August 28, 2007 at 5:30 pm
समीर जी,
प्रथम तो विवाह दिवस के शुभ अवसर पर आप दोंनो को हमारी ओर से ढ़ेर सारी शुभकामनाएं और बधाई स्वीकारें …..
मैं सोच ही रही थी कि आप कहां गायब हो गए
स्मरण के लिए बहुत बहुत हार्दिक आभार।
डा. रमा द्विवेदी
महावीर said,
August 29, 2007 at 5:54 pm
कुछ दिनों से नेट पर नहीं आ सका। आज देखा तो बड़ी सुंदर रचनाएं पढ़ने को मिलीं।
‘न जाने कौन सी आजादी’ पढ़ने के बाद तो ‘आजादी’ शब्द कहने में हिचकिचाहट लगने
लगती है। एक ऐसा खाका खींच दिया है कि यह पदाधिकारी पढ़ लें तो कुर्सी पर बैठने
से पहले इनकी आत्मा धिक्कारने लगे किंतु इनकी आत्मा पर तो धनलोलुपता का
आवरण ढका हुआ है, देखें कैसे?
‘वटवृक्ष मत बनो’ सुंदर अनुवाद है।
सबलता अगर किसी के काम न आए?
तो वह धरती पर बोझ बन जाती है,
और धरती भी उसके बोझ से,
मुक्त होना चाहती है।
सशक्त शब्दों में प्रभावशाली अभिव्यक्ति!
मुक्तक बहुत कुछ सोचने पर बाध्य कर देते हैं - आपके प्रश्नों के उत्तर कुर्सीधारी नेताओं के भाषणों में लुप्त हो जाते हैं।
डा. रमा द्विवेदी said,
August 30, 2007 at 2:31 am
आदरणीय शर्मा जी,
आपके बहुमूल्य विचारों का हृदय से स्वागत करती हूं…..अपना स्नेह बनाएं रखियेगा….. इसी कामना के साथ…..सादर…..
prakruti said,
August 30, 2007 at 7:39 am
Kab nazar aayegi , bedag sabje ki bahar /
Khoon ke dhabbe dhulenge, kitni barasaton ke baad //
ramadwivedi said,
August 30, 2007 at 5:23 pm
प्रकृति जी,
प्रथम तो ’अनुभूति कलश’ मे आपका हार्दिक स्वागत है। बहुत सुन्दर पंक्तियां प्रेषित की हैं आपने…बधाई स्वीकारें। आशा है भविष्य में भी आप अपनें विचारों से अवगत कराते रहेंगे ….सादर..