ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,
दूसरों को हंसने दें औ खुद भी मुस्कुराइए।जल रही है धरती और जल रहा जहान है,
जल रहा है चप्पा-चप्पा,जल रहा आसमान है,
नफ़रतों को त्याग कर प्यार को अपनाइए…
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए।तेरा -मेरा करके हमें कुछ नहीं मिल पाएगा,
मिल बांट्के खाएंगे गर स्वर्ग भी मिल जाएगा,
शिकवे-गिले छोड़कर अब तो मान जाइए….
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,खाली हाथ आए हैं, खाली हाथ जाएंगे,
गर किए सत्कर्म तो साथ वो ही जाएंगे,
ज़िन्दगी है चार दिन कुछ पुण्य करके जाइए..
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,पंच तत्व से बना मानव का शरीर है,
कर्ज़ है प्रकृति का तुझ पे फिर भी तू अधीर है,
ब्याज भी गर छोड़ दें मूल तो बचाइए….
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,डा. रमा द्विवेदी
इक पौधा तो लगाइए
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बहुत अच्छी पोस्ट है.
बहुत बहुत शुक्रिया संजीव जी…
बहुत खूबसूरत रचना. बहुत बधाई.
समीर जी,
बहुत बहुत शुक्रिया…
फिर से एक उत्कृष्ट रचना पढ़ने का सौभाग्य देने के लिए धन्यवाद।
निम्न पंक्तियां बहुत ही अच्छी लगीं-
पंच तत्व से बना मानव का शरीर है,
कर्ज़ है प्रकृति का तुझ पे फिर भी तू अधीर है,
ब्याज भी गर छोड़ दें मूल तो बचाइए….
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,
श्रद्धेय शर्मा जी,
आपका आशीर्वाद इस कविता को भी प्राप्त हो गया मन हर्षोल्लास से भर उठा….हार्दिक आभार सहित…..सादर…
Rama ji
Tumhari rachanyein dil ki gahraiyon se nikal kar sach ko darshati hui aas paas mandraati hai.
खाली हाथ आए हैं, खाली हाथ जाएंगे,
गर किए सत्कर्म तो साथ वो ही जाएंगे,
satya kalash bharpoor
Devi
डा. रमा द्विवेदी said…
देवी जी,
यह तो आपकी सहृदयता है कि आप मेरी रचनाओं की इतनी प्रशंसा करती है….भविष्य में भी अपने मूल्यवान विचारों से अवगत करवाती रहेंगी….आपके स्नेह के लिए दिल से आभारी हूं…..सादर….