October 19, 2007 at 5:20 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
किसी को क्या बताएं कब हमारा दम निकलता है,
अगर उनको भुलाएं हम हमारा दम निकलता है॥
यह उनके रूप का जादू पिये बिन ही बहकते हम,
नशा गर यह न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥
ये आंखें बोलतीं उनकी,जुबां रस घोलती उनकी,
अगर ये मौन हो जाएं हमारा दम निकलता है॥
घनेरी काली जुल्फ़ों संग नहीं है धूप की चिन्ता,
घटा बन गर बरस जाएं हमारा दम निकलता है॥
ये मीठे से गिले-शिकवे बहुत नीके लगें मन को,
मगर जब रूठ जाएं ये हमारा दम निकलता है॥
अदा प्यारी लगे उनकी इक सदा पर दौड़े आते है,
सहारा गर न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥
अंधेरे गहरे सागर में पुतलियां मीन सी तिरतीं,
कहीं जब चांद न पाएं हमारा दम निकलता है ॥
डा. रमा द्विवेदी
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October 11, 2007 at 5:31 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
हम दिखाएंगे दुनिया को ऐसा समां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
दूरियां लाख हैं भी तो कुछ ग़म नहीं,
पास दिल के अगर हैं तो कुछ कम नहीं,
प्यार मिलता नहीं हैजहां में हर कहीं,
प्यार मिल जाए गर थाम लो तुम वहीं,
प्यास बुझती न हो प्यार का ज़ाम लो,
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो,
प्यार का हम बनाएंगे इक आशियां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
नफ़रतों की दीवारों को तोड़ेंगे हम,
जो हैं टूटे हुए दिल से जोड़ेंगे हम,
प्यार के वास्ते लैला-मजनूं मरे,
प्यार के वास्ते’ईसा’ सूली चढ़े,
प्यार मिल जाए गर तुम उसे थाम लो,
प्यार का ज़ाम लो,प्यार का ज़ाम लो,
प्यार में हम लुटा देंगे सब कुछ यहां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
जिनको है यहां दौलत का नशा,
जानते ही नहीं प्यार में क्या मज़ा,
प्यार बिकता नहीं है जहां में कहीं,
जो बिक जाता है प्यार है वो नहीं,
प्यार मिल जाए गर तुम उसे थाम लो.
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो,
प्यार में धड़कनें सदा रहतीं जवां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
प्यार की छांव में ज़िन्दगी यूं चले,
सीप के बीच में जैसे मोती पले,
प्यार में जो सुकूं है वो कहीं भी नहीं,
प्यार बसता जहां है जन्नत वहीं,
प्यास बुझती न हो प्यार का ज़ाम लो,
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो
प्यार का हम बसाएंगे ऐसा जहां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
डा. रमा द्विवेदी
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October 5, 2007 at 4:50 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
Translated from Hindi by Elizabeth Kurian ?Mona?
Be Not A Banyan Tree
Oh mortal,
Do not become a banyan tree
Permit new plants also to flourish;
You may be great,
Firm and strong,
Therefore unshakeable,
Not letting anyone near,
Thus standing for ages.
If you take up the whole life energy,
What would be the fate of the plants nearby?
They would die an untimely death
Solely on your account
Since no plant can survive
Under your shade.
Your greatness does not lie in
Not letting anything grow;
Even if you do not provide shade,
Some other tree will do so,
Will not deprive them of life.
Like you do.
Ponder deeply
That because other plants exist,
Your existence is great;
If smallness is not present,
Where is the grandeur in bigness?
Without night, what is day?
What is greatness, which benefits none?
It becomes a load on the earth
And earth wishes to be liberated
From such a burden.
Dr. Rama Dwivedi
Hindi version
वटवृक्ष मत बनो
हे मानव !
तुम वटवृक्ष मत बनो,
नई पौध को भी उगने दो,
माना कि तुम महान हो,
सुदृढ़ शक्तिमान हो,
इसलिए जमकर डटे हो,
नहीं फटकने देते किसी को,
इसलिए सदियों तक खड़े हो।
पूरी जीवन-ऊर्जा अगर तुम ही ले लोगे,
तो आस-पास के पौधों का क्या होगा?
मर जायेंगे वे असमय में ही,
वह भी तुम्हारे कारण ,
क्योंकि तुम्हारी छाया में,
कोई पौधा पनप नहीं सकता।
तुम्हारी महानता इसमें नहीं
कि तुम किसी को पनपने न दो,
तुम अगर छाया न भी दो,
तो कोई अन्य पेड़ छाया देगा,
किन्तु तुम्हारी तरह,
जीवन तो नहीं छीनेगा।
अच्छी तरह सोच लो,
अन्य पेड़ हैं इसलिए,
तुम्हारा अस्तित्व महान है।
लघुता न हो तो गुरुता का महत्व क्या?
रात न हो तो दिन का अस्तित्व क्या?
सबलता अगर किसी के काम न आए?
तो वह धरती पर बोझ बन जाती है,
और धरती भी उसके बोझ से,
मुक्त होना चाहती है।
डा. रमा द्विवेदी
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