मिलते हैं ये जमीं-आसमां
October 11, 2007 at 5:31 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
हम दिखाएंगे दुनिया को ऐसा समां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
दूरियां लाख हैं भी तो कुछ ग़म नहीं,
पास दिल के अगर हैं तो कुछ कम नहीं,
प्यार मिलता नहीं हैजहां में हर कहीं,
प्यार मिल जाए गर थाम लो तुम वहीं,
प्यास बुझती न हो प्यार का ज़ाम लो,
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो,
प्यार का हम बनाएंगे इक आशियां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।नफ़रतों की दीवारों को तोड़ेंगे हम,
जो हैं टूटे हुए दिल से जोड़ेंगे हम,
प्यार के वास्ते लैला-मजनूं मरे,
प्यार के वास्ते’ईसा’ सूली चढ़े,
प्यार मिल जाए गर तुम उसे थाम लो,
प्यार का ज़ाम लो,प्यार का ज़ाम लो,
प्यार में हम लुटा देंगे सब कुछ यहां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।जिनको है यहां दौलत का नशा,
जानते ही नहीं प्यार में क्या मज़ा,
प्यार बिकता नहीं है जहां में कहीं,
जो बिक जाता है प्यार है वो नहीं,
प्यार मिल जाए गर तुम उसे थाम लो.
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो,
प्यार में धड़कनें सदा रहतीं जवां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।प्यार की छांव में ज़िन्दगी यूं चले,
सीप के बीच में जैसे मोती पले,
प्यार में जो सुकूं है वो कहीं भी नहीं,
प्यार बसता जहां है जन्नत वहीं,
प्यास बुझती न हो प्यार का ज़ाम लो,
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो
प्यार का हम बसाएंगे ऐसा जहां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।डा. रमा द्विवेदी
समीर लाल said,
October 11, 2007 at 10:56 pm
प्यास बुझती न हो प्यार का ज़ाम लो,
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो
प्यार का हम बसाएंगे ऐसा जहां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
–बहुत सुन्दर, वाह!!
PARUL said,
October 12, 2007 at 3:59 am
हम दिखाएं दुनिया को ऐसा समां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
सुंदर………
hemjyotsana parashar said,
October 12, 2007 at 9:08 am
आदरणीर रमा जी ,
बहुत सुन्दर रचना है , पढ कर बहुत आन्न्द मिला.
सादर
हेम
ramadwivedi said,
October 12, 2007 at 9:18 am
डा. रमा द्विवेदी said….
समीर जी, पारुल जी एवं हेम ज्योत्सना जी,
आप सबका स्नेह पाकर मन हर्षोल्लास से भर गया…दिल से आभारी हूं…अपने विचारों से भविष्य में भी अवगत कराते रहियेगा…..सादर..