हमारा दम निकलता है

           किसी को क्या बताएं कब हमारा दम निकलता है,
           अगर उनको भुलाएं  हम हमारा दम निकलता है॥

           यह उनके रूप का जादू पिये बिन ही बहकते हम,
           नशा गर यह न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥

           ये आंखें बोलतीं उनकी,जुबां रस घोलती उनकी,
           अगर ये मौन हो जाएं हमारा दम निकलता है॥

           घनेरी काली जुल्फ़ों संग नहीं है धूप की चिन्ता,
           घटा बन गर बरस जाएं हमारा दम निकलता है॥

           ये मीठे से गिले-शिकवे बहुत नीके लगें मन को,
           मगर जब रूठ जाएं ये हमारा दम निकलता है॥

           अदा प्यारी लगे उनकी इक सदा पर दौड़े आते है,
           सहारा गर न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥

           अंधेरे गहरे सागर में पुतलियां मीन सी तिरतीं,
           कहीं जब चांद न पाएं हमारा दम निकलता है ॥

               डा. रमा द्विवेदी

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9 Comments

  1. अतुल चौहान said,

    October 19, 2007 at 5:37 pm

    “मगर जब रूठ जाएं ये हमारा दम निकलता है॥”अच्छी रचना है। आभार

  2. ramadwivedi said,

    October 19, 2007 at 5:43 pm

    अतुल जी,

    अनुभूति कलश में आपका स्वागत है….आपको रचना पसन्द आई ….हार्दिक आभार..

  3. PARUL said,

    October 19, 2007 at 6:05 pm

    bahut bahut khuub..sundar rachna..RAMAA JI

  4. समीर लाल said,

    October 19, 2007 at 6:52 pm

    रचना बेहतरीन है. बधाई.

    हर बात पे कहते कि हमारा दम निकलता है-बहुत मुश्किल है जी!! :)

  5. ramadwivedi said,

    October 20, 2007 at 1:02 am

    समीर जी एवं पारुल जी,

    बहुत बहुत हार्दिक आभार,रचना पसन्द करने के लिए ।

    अनुभूति कलश के सभी पाठकों को विजय दशमी की शुभकामनाएं।

  6. मीनाक्षी said,

    October 20, 2007 at 7:03 am

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

  7. डा. रमा द्विवेदी said,

    October 22, 2007 at 5:28 pm

    मीनाक्षी जी,

    अनुभूति कलश में आपका स्वागत है :)
    रचना पसन्द करने लिए बहुत बहुत शुक्रिया….आशा है आगे भी अपना स्नेह बनाए रखेंगी….

  8. Devi Nangrani said,

    December 9, 2007 at 11:54 pm

    Rama ji

    nihayat hi sunder gazal hai.

    किसी को क्या बताएं कब हमारा दम निकलता है,
    अगर उनको भुलाएं हम हमारा दम निकलता है॥

    kabhi ruswaiyon ki is gali mein hum bhi aaye the
    magar haalat yoon badle hamara dam nikalta hai.

    Devi

  9. महावीर said,

    December 20, 2007 at 7:33 pm

    काफ़ी दिनों के बाद ‘अनुभूति कलश’ में झांक कर देखा तो पढ़ कर आनंद आगया।
    कौन सी पंक्तियों की सराहना करें, एक से एक बढ़ कर हैं। फिर भी ये शेर बहुत
    पसंद आयाः
    ये आंखें बोलतीं उनकी,जुबां रस घोलती उनकी,
    अगर ये मौन हो जाएं हमारा दम निकलता है॥
    वाह! बधाई स्वीकारें.
    महावीर

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