हमारा दम निकलता है

           किसी को क्या बताएं कब हमारा दम निकलता है,
           अगर उनको भुलाएं  हम हमारा दम निकलता है॥

           यह उनके रूप का जादू पिये बिन ही बहकते हम,
           नशा गर यह न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥

           ये आंखें बोलतीं उनकी,जुबां रस घोलती उनकी,
           अगर ये मौन हो जाएं हमारा दम निकलता है॥

           घनेरी काली जुल्फ़ों संग नहीं है धूप की चिन्ता,
           घटा बन गर बरस जाएं हमारा दम निकलता है॥

           ये मीठे से गिले-शिकवे बहुत नीके लगें मन को,
           मगर जब रूठ जाएं ये हमारा दम निकलता है॥

           अदा प्यारी लगे उनकी इक सदा पर दौड़े आते है,
           सहारा गर न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥

           अंधेरे गहरे सागर में पुतलियां मीन सी तिरतीं,
           कहीं जब चांद न पाएं हमारा दम निकलता है ॥

               डा. रमा द्विवेदी

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Published in: on October 19, 2007 at 5:20 pm Comments (9)

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9 Comments Leave a comment.

  1. “मगर जब रूठ जाएं ये हमारा दम निकलता है॥”अच्छी रचना है। आभार

  2. अतुल जी,

    अनुभूति कलश में आपका स्वागत है….आपको रचना पसन्द आई ….हार्दिक आभार..

  3. bahut bahut khuub..sundar rachna..RAMAA JI

  4. रचना बेहतरीन है. बधाई.

    हर बात पे कहते कि हमारा दम निकलता है-बहुत मुश्किल है जी!! :)

  5. समीर जी एवं पारुल जी,

    बहुत बहुत हार्दिक आभार,रचना पसन्द करने के लिए ।

    अनुभूति कलश के सभी पाठकों को विजय दशमी की शुभकामनाएं।

  6. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

  7. मीनाक्षी जी,

    अनुभूति कलश में आपका स्वागत है :)
    रचना पसन्द करने लिए बहुत बहुत शुक्रिया….आशा है आगे भी अपना स्नेह बनाए रखेंगी….

  8. Rama ji

    nihayat hi sunder gazal hai.

    किसी को क्या बताएं कब हमारा दम निकलता है,
    अगर उनको भुलाएं हम हमारा दम निकलता है॥

    kabhi ruswaiyon ki is gali mein hum bhi aaye the
    magar haalat yoon badle hamara dam nikalta hai.

    Devi

  9. काफ़ी दिनों के बाद ‘अनुभूति कलश’ में झांक कर देखा तो पढ़ कर आनंद आगया।
    कौन सी पंक्तियों की सराहना करें, एक से एक बढ़ कर हैं। फिर भी ये शेर बहुत
    पसंद आयाः
    ये आंखें बोलतीं उनकी,जुबां रस घोलती उनकी,
    अगर ये मौन हो जाएं हमारा दम निकलता है॥
    वाह! बधाई स्वीकारें.
    महावीर


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