खुद को छुपा रहा है तू
February 21, 2008 at 9:25 am (सृजन के प्रिय क्षण)
मेरे ही घर से मुझ को लेके जा रहा है तू
रखोगे ख्याल हरदम वादे भी कर रहा है तू।जब तेरे घर में आकर हम हो गए तुम्हारे,
बदला मिज़ाज़ तेरा मुझको सता रहा है तू।भूले वो अर्चनाएं , भूले वो सात फेरे .
प्रणय के इस अनुबंध को झूठा बता रहा है तू।तेरे बदलते रूप का कारण समझ सके न हम,
गिरगिट सा रंग बदलकर खुद को छुपा रहा है तू।अहसास को हमारे पलभर में रौंद डाला,
पत्थर बना के अब क्यों अरमां जगा रहा है तू।डा. रमा द्विवेदी
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ashish maharishi said,
February 21, 2008 at 10:06 am
सुंदर रचना
दीपक भारतदीप said,
February 21, 2008 at 10:33 am
अहसास को हमारे पलभर में रौंद डाला,
पत्थर बना के अब क्यों अरमां जगा रहा है तू।
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ह्रदय स्पर्शी पंक्तियाँ
दीपक भारतदीप
विनय प्रजापति said,
February 21, 2008 at 11:34 am
तू शब्द का प्रयोग करके आपने कविता में.. ऋण भाव क्यों डाला है… इसका उत्तर दें, क्या आप शादी को एक ग़लती क़रार देना चाहती हैं… ऐसा तो महादेवी वर्मा की रचनाओं में भी नहीं मिलता… उत्तर अभिलाषी…
दिनेशराय द्विवेदी said,
February 21, 2008 at 12:07 pm
जरूर कोई मतलब आ पड़ा है मुझसे
वजह यही है कि अब मुझे भरमा रहा है तू
mehhekk said,
February 21, 2008 at 12:39 pm
bahut bhavuk kavita ai badhai.
ramadwivedi said,
February 21, 2008 at 5:40 pm
आशीष जी,दीपक जी, दिनेशराय जी एवं महक जी,
आप सबको रचना पसन्द आई …आप सबकी हृदय से आभारी हूं।
डा. रमा द्विवेदी
ramadwivedi said,
February 21, 2008 at 5:41 pm
विनय जी,
प्रथम तो आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है। विनय जी मुझे यह समझ नहीं आया कि ’तू’ शब्द से आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं शादी को गलत साबित करना चाहती हूं जब कि ’तू’ शब्द आत्मीयता का सूचक है..जहां स्नेह है वहीं इस तरह संबोधन संभव है और वहीं गिले शिकवे भी संभव है। शायद आप मेरी बात से अब संतुष्ट होंगे।शेष फिर कभी….
डा. रमा द्विवेदी
विनय प्रजापति said,
February 23, 2008 at 9:07 pm
तेरे बदलते रूप का कारण समझ सके न हम,
गिरगिट सा रंग बदलकर खुद को छुपा रहा है तू।
जैसा हम सभी जानते हैं कि ग़ज़ल का हर शे’र अपने आप में एक कविता होती है और उनका परस्पर एक दूसरे से क़तई संबंध नहीं होता, अगर तो ग़ज़ल कत’अ बन जाती है…
तो फिर गिरगिट-सा रंग बदलने का अभिप्राय…