क्षणिकाएं
March 7, 2008 at 5:01 pm (क्षणिकाएं)
१- लद गए वे दिन,जब
चंदन किसी अमीर की लाश
जलाने के काम आता था,
आज तो लोग चंदन रहना चाहते हैं,
इसलिए शव को श्मशान में नहीं ,
क्रेमीटोरियम में जलाना चाहते हैं।२- अब गम का मरहम,
उदासी,खमोशी या
आंसू बहाना नहीं,
टेलीविजन अब
मातम तक का
मरहम बनगया है।३- न्युक्लियर परिवार में
मातम के समय पर भी,
कुछ ढ़ाढ़स, कुछ सहानुभूति या
आत्यीयता के कुछ शब्द,
अब हमारे पास बचे कहां हैं,
सिवाय इसके, टेलीविजन देखकर,
एक दूसरे से नज़रें चुराने के सिवा।४- हर परम्परा और ,
रीति-रिवाज का अब
सरलीकरण हो गया है,
इसलिए ही तो
अपने प्रिय के शव कोभी,
कंधे पर उठाकर,
श्मशान तक ले जाने का सफ़र,
पैदल नहीं,
गाडियों से तै हो गया है।५- ऐसे भी लोग देखें हैं हमने,
गए थे मातम को बांटने,
घंटी बजाई,
दरवाजा खुला देखा,
सामनेवाले टी.वी. देखने में व्यस्त हैं।६- कैसी विड़म्बना है,
पिता की अथाह संपत्ति,
पाने के लिए,
कुत्ते-बिल्ली से लड़ते हैं,
और उनकी तस्वीर पर,
चंदन का हार डालकर,
अपने हृदय के उदारीकरण की
इतिश्री कर देते हैं।डा. रमा द्विवेदी
paramjitbali said,
March 7, 2008 at 6:13 pm
बढिया क्षणिकाएं हैं।बधाई।
ऐसे भी लोग देखें हैं हमने,
गए थे मातम को बांटने,
घंटी बजाई,
दरवाजा खुला देखा,
सामनेवाले टी.वी. देखने में व्यस्त हैं।
हर्षवर्धन said,
March 8, 2008 at 3:41 am
समाज के गिरते मूल्यों पर बहुत तगड़ी चोट की है आपने।
डा. रमा द्विवेदी said,
March 8, 2008 at 5:53 pm
परमजीत जी एवं हर्ष जी,
उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया…
महावीर said,
March 13, 2008 at 1:18 am
रमा जी
आपकी हर रचना की अभिव्यक्ति में एक ऐसी विशिष्टता है जो हिंदी-काव्य के लिए सर्वथा
गौरव की बात है। इन क्षणिकाओं में भी वही लक्षित है। समाज की गिरावट का
चित्रण बड़ी खूबी से किया है। न्युक्लिर परिवार देख कर समाज का ढांचा ही
अस्त-व्यस्त हो गया है।
‘ऐसे भी लोग देखें हैं हमने,
गए थे मातम को बांटने,
घंटी बजाई,
दरवाजा खुला देखा,
सामनेवाले टी.वी. देखने में व्यस्त हैं।’
बिल्कुल सत्य है।