विवशता
March 29, 2008 at 5:54 am (संवेदना की अनुभूतिय)
हे सृजनकर्ता,
तूने यह कैसी दुनिया बनाई,
आदमी, आदमी को खा रहा है,
जन्मदाता भी भक्षक बन रहा है.
मानवीय प्रकृति के समीकरण,
बड़ी तेजी से बदल रहे है,
संवेदनशीलता नए सांचे में ढ़ल रही है,
कलियों को खिलने से पहले ही,
मसला कुचला जा रहा है,
दहशत ही दहशत,
आंख के आंसू सूख चुके हैं,
वाणी मूक है, कान बहरे हो गए हैं,
किससे फ़रियाद करें?
जहां जाएं खूंख्वार भेड़िए ,
मांस खाने के लिए घात लगाए बैठे हैं,
शायद इसलिए ही वह,
कई नर्कों से बचने के लिए,
एक ही नर्क भोगने के लिए विवश है।डा. रमा द्विवेदी
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abrar ahmad said,
March 29, 2008 at 10:50 am
बहुत खूब। सामाजिक वेदना को साकार रूप देने के लिए बधाई।
नीरज त्रिपाठी said,
March 29, 2008 at 2:27 pm
आंख के आंसू सूख चुके हैं,
वाणी मूक है, कान बहरे हो गए हैं,
किससे फ़रियाद करें?
जहां जाएं खूंख्वार भेड़िए ,
मांस खाने के लिए घात लगाए बैठे हैं,
शायद इसलिए ही वह,
कई नर्कों से बचने के लिए,
एक ही नर्क भोगने के लिए विवश है…………bahut achhi panktiyan hain
समीर लाल said,
March 29, 2008 at 2:38 pm
बहुत बेहतरीन प्रस्तुति..आभार.