दो मुक्तक

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    १-   जरा-मरण के बीच में
          दूरी है इक साँस की।
          साँस रुकी तो मृत्यु मिलेगी,
          मृत्यु रुकी तो ज़िन्दगी॥

   २-   ज़िन्दगी के रंगों में
          इक रंग मुझको भा गया।
          जीते-जीते ज़िन्दगी पर ,
          प्यार मुझको आ गया॥

       डा. रमा द्विवेदी
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3 Comments

  1. mehhekk said,

    April 13, 2008 at 6:20 pm

    bahut sundar

  2. DR. CHANDRAKUMAR JAIN said,

    April 18, 2008 at 6:18 am

    सुंदर.सजग.सकारात्मक प्रस्तुति.
    जीवन दर्शन और
    बोध से सधी हुई.
    बधाई .

  3. ramadwivedi said,

    April 18, 2008 at 12:36 pm

    महक जी एवं डा. जैन जी,

    रचना पर अपने विचार प्रेषित करने के लिए हार्दिक आभार….

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