परजीवी लता नहीं बनना है

           हमें परजीवी लता नहीं बनना है,

           जड़-जमीन हीन,अस्तित्व विहीन,

           दी्न-हीनता   को  तजना  है,

           हमें परजीवी लता नही बनना है।

 

           न रहो कभी किसी  की आश्रिता,

           खुद बनकर  स्वावलंबी बनो हर्षिता,

           हमें खुद अपना संबल बनना है ।

           हमें परजीवी लता नहीं बनना है ॥

 

           न करे हमारा कोई शोषण-कुपोषण,

           सावधान   रहना  है  हमको  हरदम,

           हमें  अपनी रक्षा खुद करना है।

           हमें  परजीवी लता नहीं बनना है॥

 

           पराश्रिता का न होता कोई सम्मान,

           जो भी चाहे करते हैं उसका अपमान,

           ऐसे  जीवन  को  हमें  बदलना है।

           हमें  परजीवी  लता नहीं  बनना है॥

 

           हर  खुशी  हमारी  थाती  है,

           हम हरदम मुस्काती- गाती हैं,

           हर  मधुमास हमारा अपना है।

           हमें परजीवी  लता नहीं बनना है॥

 

          यह   राह   बड़ी   है    पथरीली,

          हरदम  पलकें  होतीं  गीली,

          हर कदम पे हमें संभलना है।

          हमें   परजीवी  लता नहीं बनना है॥

             डा. रमा द्विवेदी

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यूँ न मिटाईए

 अजन्मी भ्रूणी बेटी को यूँ न मिटाईए।

मुझे मारर्ने से पहले कुछ तो विचारिए॥

बेटी का प्यार है अपार माँ-बाप के लिए,

राखी के तन्तुओं से बंधा प्यार भाई के लिए।

हर रिश्ते की धुरी में बेटी को पाईए।

संतुलन बिगड़ रहा बेटी को खोने से,

जुल्म और भी बढ़ेगें बेटी के नहीं होने से।

सृष्टि के संतुलन को कुछ तो संभालिए।

करता है अंग-भंग जब चाकू से डाक्टर,

डर-डर के चीखती है माँ-माँ पुकार कर,

करती है आर्तनाद पापा बचाईए ।

मुझसे हुई ख़ता क्या जो माँ रूठ तू गई,

मिलने से पहले ही तू मुझसे दूर हो गई,

अपने ही प्रतिरूप को यूँ न संहारिए।

डा. रमा द्वि्वेदी

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उसके जैसे (क्षणिका)

  तुम उसके जैसे,

बनने की कोशिश,

कभी मत करना,

क्यों कि तुम,

वो नहीं बन सकते,

लेकिन तुम बहुत कुछ,

बन सकते हो,

जो वे नहीं बन सके।

   डा. रमा द्विवेदी

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