अजन्मी भ्रूणी बेटी को यूँ न मिटाईए।
मुझे मारर्ने से पहले कुछ तो विचारिए॥
बेटी का प्यार है अपार माँ-बाप के लिए,
राखी के तन्तुओं से बंधा प्यार भाई के लिए।
हर रिश्ते की धुरी में बेटी को पाईए।
संतुलन बिगड़ रहा बेटी को खोने से,
जुल्म और भी बढ़ेगें बेटी के नहीं होने से।
सृष्टि के संतुलन को कुछ तो संभालिए।
करता है अंग-भंग जब चाकू से डाक्टर,
डर-डर के चीखती है माँ-माँ पुकार कर,
करती है आर्तनाद पापा बचाईए ।
मुझसे हुई ख़ता क्या जो माँ रूठ तू गई,
मिलने से पहले ही तू मुझसे दूर हो गई,
अपने ही प्रतिरूप को यूँ न संहारिए।
डा. रमा द्वि्वेदी
© All Rights Reserved
यूँ न मिटाईए
The URI to TrackBack this entry is: http://ramadwivedi.wordpress.com/2008/05/04/%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%8f/trackback/
bahut hi sahi kaha,beti ki hatya se nisargka santulan bigad raha hai,bahut khub badhai.
बिल्कुल सहमत-भावपूर्ण ढंग से आपने इस प्रसंग को रखा है. बधाई.
करता है अंग-भंग जब चाकू से डाक्टर,
डर-डर के चीखती है माँ-माँ पुकार कर,
करती है आर्तनाद पापा बचाईए ।
कडुवा सच..संवेदित करती रचना..
***राजीव रंजन प्रसाद
महक जी, समीर जी एवं राजीव जी,
आप सबकी हृदय से आभारी हूं…
अच्छी रचना है |
आज के आधुनिक युग मे भी यह क्रूर कर्म कभी कभार नज़र आ जाता है |
इसका खेद है |
रचना से कुछ सुधार हो, ऐसी अपेक्षा है |
– अवनीश तिवारी