आसान नहीं

           

          चुप-चुप रह कर आंसू पीना,
          आसान न यह गम होता है।
          मिट-मिट करके जीते जाना,
          आसान न यह दम होता है॥

          बंधुआ बन-बन कर जीना,
          आसान न वो मन होता है।
          तप-तप कर कुछ बनते जाना,
          आसान न यह फ़न होता है॥

          तन का बंधन,मन का क्रंदन,
          यह बोझ न कुछ कम होता है।
          कोल्हू के बैल सा चलते जाना,
          आसान न यह श्रम होता है॥

          सच्चाई पर चलते जाना ,
          आसान न यह पथ होता है।
          उम्मीदों पर जीवित रहना,
          आसान न यह भ्रम होता है॥

           डा. रमा द्विवेदी         

 

 

 

 

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12 Comments Leave a comment.

  1. bahut sundar rachna.badhai.

  2. तन का बंधन,मन का क्रंदन,
    यह बोझ न कुछ कम होता है।
    कोल्हू के बैल सा चलते जाना,
    आसान न यह श्रम होता है॥
    bahut sundar baat kahi,aasan koi chiz nahi jeevan mein,.

  3. सच्चाई पर चलते जाना ,
    आसान न यह पथ होता है।
    उम्मीदों पर जीवित रहना,
    आसान न यह भ्रम होता है॥

    -वाह, बहुत खूब कहा आपने. बधाई.

  4. bahut sahi kaha apne,dil ki bat ki…….atiuttam rachna.

  5. सुन्दर है आपकी रचना

  6. डा. रमा द्विवेदी

    रंजना जी,

    अनिभूति कलश पर प्रथम बार आने पर आपका स्वागत है….आपने रचना की सराहना की …आशा है आगे भी आप अपने विचारों से अवगत करवायेंगी…हार्दिक आभार…

    महक जी,

    आपके शब्दों से कविता और भी महक उठी है…बहुत बहुत शुक्रिया….

    समीर जी,

    आपका आना और रचना को मलय समीर से सहला जाना…आपके बिना अनुभूति कलश की कोई भी रचना पूर्ण नहीं होती…दिल से आभारी हूं आपकी निरन्तर प्रतिक्रियायों के लिए…स्नेह बनाए रखें…

    रश्मी जी,

    अनुभूति कलश पर प्रथम पदार्पण पर आपका स्वागत है…आपको रचना पसन्द आई..दिल को अच्छा लगा…हार्दिक धन्यवाद…आप भविष्य में भी अपने विचारों को यहां प्रेषित करेंगी…इसी आशा के साथ…

    आदरणीय राकेश जी,

    आपका आशीष मेरे लिए विशेष मायने रखता है…सृजनशीलता को एक नई ऊर्जा और नई स्फूर्ति मिलती है….स्नेह बनाए रखियेगा…बहुत बहुत हार्दिक आभार…

  7. bahut hi sundar..! badhai

  8. बहुत सुंदर रचना है।
    सच्चाई पर चलते जाना ,
    आसान न यह पथ होता है।
    उम्मीदों पर जीवित रहना,
    आसान न यह भ्रम होता है॥
    बहुत बड़ा सत्य है यह।

  9. तन का बंधन,मन का क्रंदन,
    यह बोझ न कुछ कम होता है।
    कोल्हू के बैल सा चलते जाना,
    आसान न यह श्रम होता है॥

    _____________________________________
    बहुत सुंदर रचना
    दीपक भारतदीप.

  10. तप-तप कर कुछ बनते जाना,
    आसान न यह फ़न होता है॥

    kya baat hai
    puri rachna he gahere bhav samete hue hai .

  11. bhut sundar rachana. badhai ho. likhti rhe.

  12. Thank you dr diwedi
    I can clearly see the positioned attack launched by you in mitigating all the factors damging value crisis.Your poem on one side scans very gently the state of society and on the other side very politely evokes the latent members of society.Please cayy on this way and I will witness ‘one issue one poem ‘approach.I have strong confidence that effortlessely and by your simplicity you will start a dynamic change.My best wishes to you and I pray for your success in this ‘mahasamar’
    Best Regards
    Dr Vishwas Saxena


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