हम सबको है नशा

         कौन कहता है केवल शराब में है नशा?
         हम सबको यहां कोई न कोई है नशा ?
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         कर्म में है नशा, धर्म में है नशा,
         मर्म में है नशा, शर्म में है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो अधर्म में भी है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         नेता को है नशा, प्रणेता को है नशा,
         सृजेता हो है नशा, विजेता को है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब श्रोता को है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         चित्रकार को है नशा, शिल्पकार को है नशा,
         कलाकार को है नशा, गीतकार को है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो कलमकार को है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         राम में है नशा, नाम में है नशा,
         ज़ाम में है नशा, काम में है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो दाम में भी है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         गीत में है नशा, संगीत में है नशा,
         मीत में है नशा, प्रीत में है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो दीवानगी में है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         शोहरत में है नशा, दौलत में है नशा,
         शोहबत में है नशा, मोहब्बत में है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो हुकूमत में है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         ज़िन्दगी में है नशा, बन्दगी में है नशा,
         सादगी में है नशा, पसन्दगी में है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो रंगीनगी में है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         सृष्ठि में है नशा, व्यष्ठि में है नशा,
         समष्ठि में है नशा, प्रवृत्ति में है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो दृष्ठि में है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         गीता में है नशा, पूजा में है नशा,
         कविता में है नशा, मनीषा में है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो वक्ता को है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

         इनको भी है नशा, उनको भी है नशा,
         तुमको भी है नशा, मुझको भी है नशा,
         सच पूछिए ज़नाब तो हम सबको है नशा।
         नशा ही नशा है हर चीज में है नशा॥

            डा. रमा द्विवेदी   ……..         

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स्त्री विमर्श की कविताएँ ’दे दो आकाश’—अशोक शुभदर्शी

’दे दो आकाश’ काव्य संग्रह की कविताएँ देवनदी की जलधाराओं जैसी कल-कल करती हुई बहती हैं। इस जलधारा में कोई डुबकी लगाकर तो देखे वह पवित्र होकर ही नहीं निकलेगा बल्कि एक नई ऊर्जा और नई चेतना लेकर भी निकलेगा। लगता है पुस्तक की कवयित्री पहले स्व्यं खूब इस जलधारा में गहराई तक डूबी, बार-बार डूबी, फिर इस धारा को सर्वसुलभ बनाने में सफल हुई। कविताओं के शब्दों में कवयित्री के मन के भाव
 उतर गए हैं, अकसर यह नहीं होता। अकसर यह हो जाता है कि कवि कहना कुछ चाहता है और उसके शब्द कुछ और कहते हैं। संग्रह की कविताएँ पढ़कर ऐसा लगता है कि कवयित्री हड़बड़ी में कभी नहीं रही है। कवयित्री ने शब्द-शब्द तौला है, अपने भाव को प्रकट करने लायक शब्दों की तलाश की है, फिर अपनी कविताओं में उन्हें स्थान दिया है। आजकल कवि जल्दी से जल्दी अपनी कविताएँ लेकर लोगों के पास आना चाहता है और आता
 है। इस हड़बड़ी में उसकी कविताएँ प्रौढ़ नहीं रहतीं। डॉ. रमा द्विवेदी की कविताएँ उनके अंतर्मन की पाकशाला में खूब पकी हैं।

काव्य-संग्रह में युगीन समस्याएँ उजागर हुई हैं। नारी की स्थिति पर कवयित्री का ध्यान अत्याधिक गया है। नारी चेतना को जरूरी ठहराती हुई कवयित्री नारी को उसी चेतना में ऊपर उठने का संदेश देती हैं – कोमलता को कमजोर समझता यह है तेरी नादानी/ आती है बाढ़ नदी में जब, जग को करती है पानी-पानी। नारीत्व कमजोरी नहीं है। नारीत्व शक्ति का सच्चा स्रोत है।

भारतीय संस्कृति में ही यह ऊर्जा विद्यामान है। इस ऊर्जा की पहचान कवयित्री को पूरी तरह हुई है। तभी तो कवयित्री कहती है – तू अपनी पहचान को विवशता का रूप न दे/ वर्ना नर भेड़िए तुझे समूचा ही निगल जाएँगे। नारी जागरण की समस्या पूर्व से ही भयावह और गंभीर है। आज की नारी कुछ-कुछ जागी भी है। उसने जगह-जगह अपनी पहचान बनाई है, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। नारी को पूर्णतः जागने
 की जरूरत है। नारी घर के दीपक की तरह है। नारी जागेगी तो घर रोशन होगा। नारी शिक्षा का अनुपात अभी भी कम है फिर कवयित्री की इच्छा नारी को सिर्फ साक्षर देखने की नहीं है वरन्‍ वे चाहती हैं कि आज की नारी पूर्ण सबल हो जाए। वह चाहती है कि आज की नारी पत्नी जरूर बने किंतु आश्रिता न बने –

न रहो कभी किसी की आश्रिता,
खुद बनकर स्वावलंबी बनो हर्षिता
हमें खुद अपना संबल बनना  है
हमें परजीवी लता नहीं बनना है॥

नारी को इतना साफ संदेश अन्यत्र दुर्लभ है। इस कार्य में कवयित्री इसलिए सफल हुई है क्योंकि वह स्वयं स्त्री है और स्त्री की समस्याओं को पुरुष रचनाकार की तुलना में ज्यादा समझती है।

वह कामना करती है कि प्रत्येक नारी अपने नारीत्व को शीर्ष तक पहुँचावे। उसे एक आकाश मिल जाए। काव्य-संग्रह का शीर्षक भी यही संदेश देता है। शीर्षक में नारीत्व के शिखर को छूने की अपेक्षा है। शीर्षक से कवयित्री की दूसरी अपेक्षा झलकती है कि कवयित्री अखंड शून्यता को प्राप्त करना चाहती है। अखंड शून्यता की प्राप्ति की प्रक्रिया स्त्री शक्‍ति का चरम स्थिति तक पहुँचना है। स्त्री
 शक्‍ति वेदना सहने की शक्‍ति है। अपनी ही आत्मा की खॊज में मन की निरंतर चलने वाली प्रार्थना है। कवयित्री शायद आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त करने के लिए व्यग्र है। काव्य संग्रह में संकलित दे दो आकाश कविता में कवयित्री कहती है –

राज मुबारक तुमको, ताज़ मुबारक तुमको,
बस चाहते हैं इतना, दे दो आकाश हमको।

वह प्रेम का अर्थ समझाती हुई कहती है –

प्रेम दिल की पुकार है
हृदय का विस्तार है।

कुल मिलाकर इनकी कविताओं में एक बात रेखांकित करने लायक है कि नारी को नारीत्व पर ही भरोसा करना चाहिए। उसी में ताकत है –

पुरुषों की पशुता को पराजित कर
स्वयं की महत्ता उद्‍घाटित कर।

यह विशिष्टता इनकी कविताओं में उभरी है इसलिए कवयित्री विशिष्ट हो गई है। नारी जागर्ण में कुछ नाम उदाहरण की तरह हैं जिनकी चर्चा वह करती है। वह दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सीता, सावित्री की तरह जगने के लिए कहती है तो आधुनिक युग में सोनिया गाँधी में वे त्याग के महान गुण देखती है।

जहाँ आज की कविताएँ बुद्धिविलास का एक अंग हो गई हैं, शिल्प और बिंब ढूँढने के प्रयास में वह अंधेरी गुफा में प्रवेश हुई दीखती है। इस फेर में ये कविताएँ आम लोगों से कटती जा रही हैं, वहीं  रमा द्विवेदी की कविताएँ सहज और सरल हैं। वे बातें साफ-साफ रखती हैं।

कवि निर्मल मिलिंद ने संग्रह के स्वर को स्पष्ट करते हुए लिखा है – “नारी चेतना और स्त्री का स्वाभीमान दे दो आकाश का मूल स्वर है, हालांकि पर्यावरण की चिंता से लेकर राष्ट्ररक्षा में तैनात सैनिकों के बलिदान के प्रति असीम निष्ठा तक कवयित्री का रचना संसार फैला हुआ है, तथापि मुझे लगता है कि प्रेम कवयित्री का सहज स्वभाव है और विद्रोह उसकी अस्मिता की जरूरत।”

प्रो. टी. मोहन सिंह के शब्दों में – “इस काव्य में कवयित्री की काव्य चेतना के दो तट दिखाई देते हैं। प्रथम तट नारी की मुक्ति चेतना से संपन्न है तो दूसरा तट लोकबोध संबंधी है।”

आचार्य शिवचंद्र शर्मा ने पुस्तक की मूलधारा को उद्‍घाटित करते हुए कहा है – “जीवन का बहुरंगी चित्रण होते हुए भी डॉ. द्विवेदी जी के गीतों में स्त्री वेदना विशेष रूप से मुखरित है।”

संग्रह मेम १०० कविताएँ संग्रहीत हैं। कविता, मुक्तक एवं गीत के संगम की छ्टा निराली है। छ्पाई साफ सुथरी और आवरण आकर्षक है।

 साभार  :  `भाषा’-जुलाई-अगस्त,२००६,

प्रकाशकीय कार्यालय: केंद्रीय हिंदी निदेशालय माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग,

मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार

 

ज़िन्दगी है खूबसूरत

      ज़िन्दगी है खूबसूरत और रंग भी बेशुमार हैं,
      आदमी की फ़ितरतों से ज़िन्दगी बेहाल है।
 
      अधिकार की भूख आज सुरसा सी बढ़ गई,
      कर्तव्य के खेत को अहं की तृष्णा चर गई,
      श्मसान से रिश्ते लगे,स्वार्थ का यह हाल है।

      स्नेह तन्तु शिथिल हुए सब कुछ बिखर-बिखर गया,
      कहने को तो हम साथ हैं पर मन भटक-भटक गया,
      अनुबंध भी स्वच्छंद हैं हर रिश्ते में मलाल है।

      दोस्ती का रंग भी आज फीका पड़ गया ,
      दोस्ती का मतलब, मतलब ही तक रह गया,
      दोस्ती के बीच अब सवाल ही  सवाल हैं।

      माता-पिता में तन रही, भाई-बहन में ठन रही,
      अधिकार की जंग में देशों में भी न बन रही।
      मेरा-मेरा ही सब करें चारो तरफ  बवाल है।

        डा. रमा द्विवेदी
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Published in:  on August 25, 2008 at 10:53 pm Comments (2)
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कादम्बिनी क्लब, लखनऊ ने प्रेमचन्द जयन्ती मनाई

 प्रस्तुति: प्रो.उषा सिन्हा (लखनऊ विश्व विद्यालय)
       प्रेमचंद जयन्ती के उपलक्ष्य में भाषाविज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय में कादम्बिनी क्लब के तत्वावधान में दिनांक ३१-७-२००८ को संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
    हैदराबाद से पधारीं “कादम्बिनी क्लब,हैदराबाद” की वरिष्ठ सदस्या डा. रमा द्विवेदी कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं। दीप प्रज्जवलन एवं सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ  हुआ । प्रो.उषा सिन्हा  और डा. मधु चतुर्वेदी ने मुख्य अतिथि  डा. रमा द्विवेदी का का स्वागत करते हुए पुष्प गुच्छ भेंट किए । तत्पश्चात प्रो. सिन्हा ने कलम के सिपाही ,कथा सम्राट, उपन्यासकार प्रेमचन्द  के कृतित्व की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला एवं उनकी साहित्यिक मान्यताओं को रेखांकित किया। डा. त्रिलोकीनाथ सिंह ने प्रेमचन्द जी के साहित्यिक योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि-”गरीबी अज्ञानता,अत्याचार, शोषण ,जमींदारी-मानसिकता, गरीब की झोपड़ी तक पहुंच कर अन्दर की व्यथा को जगजाहिर करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और जो लेखन उभर कर आया उसने एक सामाजिक क्रान्ति को जन्म दिया। आज जिन परिस्थितियों, घटनाओं को मीडिया,विशेषता इलेक्ट्रानिक मीडिया मिनटों में घर-घर पहुंचा देता है उसे बाहर लाने में प्रेमचंद को पूरा जीवन लगाना पड़ा”।
       इस अवसर पर डा. रमा द्विवेदी ने कहा कि अहिन्दी भाषी प्रदेश में हिन्दी भाषाभाषियों को साहित्य और लेखन से जोड़ना कादम्बिनी क्लब का प्रमुख लक्ष्य है। उन्होंनें हैदराबाद के कादम्बिनी क्लब की गतिविधियों की विस्तार से चर्चा की । डा. रमा द्विवेदी ने कहा-इस कार्य में क्लब की अध्यक्षा डा. अहिल्या मिश्र का योगदान महत्वपूर्ण है । उन्होंनें वहां के मारवाड़ी समाज, जैन समाज को  जोड़ा है और उनका भरपूर सहयोग भी मिलता है ।

      डा. रमा द्विवेदी ने अपनी सद्य: रचित कई कविताओं का सस्वर पाठ किया । भ्रूण हत्या, दिल की दूरी और माया कविताएं विशेष रूप से सराही गईं। कुछ पंक्तियां उद्धृत हैं—
      अश्रु तक बिक जाते हैं, “माया” के दरबार में,
      चीखों का कितना मूल्य है,सांसों के व्यापार में।

      “माया” की संगमरमर जमीं पर, अश्रु जल दिखता नहीं,
       हर कोई है फिसल जाता, कुछ रीढ़ पर टिकता नहीं।

       डा. रमा द्विवेदी के सस्वर काव्यपाठ की सभी के द्वारा करतल ध्वनि से प्रशंसा की गयी । इस अवसर पर कादम्बिनी क्लब की, मोहम्मद बाग की सदस्यों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं ।
 डा. शारदा लाल,डा. सुमन श्रीवास्तव,नलिनी खन्ना,डा. उषा राय,सुशीला पुरी,और नई सदस्या डा. लक्ष्मी रस्तोगी ने काव्यपाठ किया। सुधा मिश्रा ने आजादी पर ओजस्वी कविता पढ़ी। संयोजिका डा. मधु चतुर्वेदी ने कहा -कन्या भ्रूण हत्या जैसे विषयों पर लेखन सक्रिय होना चाहिए। लेखनी  से क्रान्ति आ सकती है। इसी के साथ उन्होंने हिन्दी की रुबाईयां सुनाईं।
     मधु जी ने महिला लेखन के नाम पर”तसलीमा” के लेखन की आलोचना में महिला लेखिकाओं को आगे आने का आह्वान किया। सदस्याओं नेनारी अस्मिता और कन्या-जीवन बचाने के संबंध में अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कीं।
       कार्यक्रम के अन्त में प्रो. उषा सिन्हा ने समस्त सदस्याओं के सहयोग और सहभागिता की प्रशंसा करते हुए डा. सिन्हा ने कहा लखनऊ के कादम्बिनी क्लब को हैदराबाद -कादम्बिनी क्लब से परिचित कराने में डा. रमा द्विवेदी ने सेतु का कार्य किया है। साथ ही “पुष्पक” साहित्यिक पत्रिका से  भी जोड़ने का स्तुत्य कार्य किया है। प्रो. सिन्हा ने डा. रमा द्विवेदी के काव्य संग्रह “दे दो आकाश” की सारगर्भित चर्चा करते हुए उसकी कुछ कविताएं भी उद्धृत कीं। डा. मधु जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ ।

सभी मित्रों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।

Published in:  on August 15, 2008 at 6:15 pm Comments (4)
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