क्या बात अब तुझसे करूं,हर ख़्वाब तन्हा रह गए।
जो बात हम न कह सके, वो अश्रु बन कर बह गए॥प्रणय के इस अनुबंध को इक बार भी न गुन सके,
झीनी चदरिया प्रेम की इक तार भी न बुन सके,
अहसास बन गए कफ़न तन से लिपट कर रह गए।
जो बात हम न कह सके, वो अश्रु बन कर बह गए॥कहने को तो हम साथ थे,पर सांसों में थीं दूरियां,
वनवास इक कमरे में था,थीं दिल की कुछ मजबूरियां,
मैं सरिता बन बहती रही,तुम ‘कूल’ बन कर रह गए।
जो बात हम न कह सके, वो अश्रु बन कर बह गए॥कुछ चाहतें अपनी अधिक थीं, या हमारी भूल थी,
कैक्टस के संग गुलाब था, बस हर घड़ी इक शूल थी,
हर पल लहुलुहान थे , यह दर्द भी हम सह गए।
जो बात हम न कह सके, वो अश्रु बन कर बह गए॥उम्मीद थी इक रोज तुम हमको समझ कुछ पाओगे,
खुद के अहम को त्याग कर,दिल से हमें अपनाओगे,
बस इक इसी उम्मीद में दिन-रात-दिन गुज़र गए।
जो बात हम न कह सके, वो अश्रु बन कर बह गए॥डा. रमा द्विवेदी
हर ख़्वाब तन्हा रह गए
“सारा आकाश नहीं चाहिए, आधा या सिर्फ मुट्ठी भर” -समीक्षक: वरिष्ठ पत्रकार रवि श्रीवास्तव (हैदराबाद)
काव्य संग्रह “दे दो आकाश” की कविताओं के बारे में कुछ कहने से पेशतर हमें जरूरी लगा कि यह बात साफ कर दी जाए कि”पीड़ा न हो तो न मरहम की जरूरत हो,न उसका निर्माण”। संग्रह की रचनाओं से गुज़रते हुए पता नहीं क्यों जहां-जहां भी महसूस हुआ हमने धुर अतीत और चिर आधुनिक के बीच नारी मन से नि:स्त्रत होने वाले झरने की बूंदों को मन से पकड़ने की कोशिश की। “कविता की किताब” पढ़ने का हमारा अलग अंदाज़ है। कविता पढ़ने से पहले हम कुछ नहीं पढ़ते । न उसके बारे में लोगों की सम्मतियां, न रचनाकार की आत्मकथ्यात्मक भूमिका ,न और कुछ। रचनाओं से गुज़र जाने के बाद ही कवि- परिचय और बाकी सब आते हैं। इससे होता यह है कि कविता ही साथ रहती है। उसके आगे न कवि निकल पाता है,न किसी और का प्रभामंडल आंख बंद कर पाता है। बाद में हम जांचते हैं कि क्या हमारा निष्कर्ष भी वही है जो औरों का है ,या कुछ अलग ।
बहुत चर्चित हो रही और कद्दावर पारिवारिक पृष्ठभूमि वाली डा. रमा द्विवेदी और उनकी “वर्जिन” कृति”दे दो आकाश” से हमारा परिचय पहली बार अंदर की कविताओं से ही होता है। रचनाओं के शब्दालोक से गुज़रने के बाद , जब रचनाकार का परिचय पा लिया तो लगा कि नारी मुक्ति की कथित पक्षधरता का कहीं लेश संकेत भी कविताओं में नहीं मिला । जिन अन्य विद्वानों का ख्याल है कि कृति के अधिकांश गीत, नारी की “दु:खद परिधि” से जुड़े हैं, वे किसी हद तक सही तो लगते हैं, किन्तु”मुक्ति के लिए छटपटाती नारी,” सही अर्थों में न किसी कविता में मिली, न गीत में न मुक्तक में । हम यह बात इसलिए कह रहे हैं कि “नारी-मुक्ति” का मुहावरा एक भ्रामक ’प्रावर्ब’ बना डाला गया है । मुक्ति किससे? इसीलिए हम रमा जी की कविता को ’सरोकार’ की कविता मानते हैं, जिनका स्वर यह है कि वह महज़ स्वतंत्र पहचान वाले विस्तारित नारी जीवन की आंकाक्षी हैं और इसका प्रमाण मिल जाता है स्वयं रमा जी के “कुछ मेरी अनुभूतियां,आपके लिए”,कथ्य के पूरे तीसरे पैराग्राफ में। यानी “जबसे होश संभाला है………से लेकर लेखनी उठाई थी” तक की पूरी आठ पंक्तियों में । उनका रचनाकार “सारा आकाश” नहीं मांग रहा है, सिर्फ मुट्ठी भर चाहता है । वह मिलना ही चाहिए ।
रमा द्विवेदी मुक्ति की नहीं ’सरोकार’ की कृतिकार लगती है। सरोकार ,समय के साथ नए परिधान पहनता है। लगभग २४ वसंतों की गठरी बांधे,अब से करीब १८ वर्ष पहले लिखी गई ’आधुनिक नारी के नाम’वाली कविता को रमा खुद काल की कसौटी पर घिस कर देखेंगी तो पाएंगी कि नारी तो पुरुष के ‘पशु’ को पराजित कर अपने ‘नवदुर्गात्व’ की बानगी उद्घाटित और प्रस्तुत कर चुकी है। फिर भी यदि समाज में महिषासुरी प्रवृत्ति जिन्दा है, तो यह तय है कि रचनाकार जो मिटाना चाहता है, वह अमिट है।
‘तलाश’ शीर्षक वाली कविता में बयां दर्द शाश्वत है क्योंकि ऐसी ही तलाश ,शकुन्तला और दुष्यंत के बीच भी थी और राम-सीता,मीरा-मोहन,रुक्मिणी-कृष्ण और रावण तथा मन्दोदरी के बीच भी। ‘प्रेम’ को खुल कर जी पाना’ न किसी युग में संभव था, न होगा। इसीलिए यह ‘तलाश’ अतृप्ति का वरदान लगती है । इस प्यास का बना रहना ही,कविता का जनक और जननी है।
‘खुद ही तकदीर बनानी होगी’ कविता का सारांश पता नहीं क्यों ठीक नहीं लगता‘। ‘मरना अच्छा’,कवि का संदेश नहीं होना चाहिए। कवि और कविता को जीवन के स्पंदन की बात करनी चाहिए। याद आ गई रामायण की अहल्या, जिसने कहा था कि ‘मुनि शाप जो दीन्हा,अति भल कीन्हां…? क्योंकि उसने ऐसा कहके अपने पाषाणत्व में से जीवन की हरी दूब अंकुरित की थी। बात तो सारे अनचाहे बाधक तत्वों को मार कर जीने की होनी चाहिए।
’विदेश में तड़पती हूं’ पंकज उधास का गाया गीत..,चिट्ठी आई है,आई है चिट्ठी आई है…’ गीत याद आ गया । ’देश की मिट्टी,देश की हवा,देश का पानी,देश की दवा के प्रति तड़प ही राष्ट्र चेतना है। रमा में यह कविता दिखाई देती है।
’क्लोन मानव’ -में उठाए गए सवाल का जवाब कौन देगा? रमा जी को शायद याद हो ’रक्तबीज’का नाम, जिसके ‘क्लोन’के लिए चंडी ने कपाल-खप्पर उठा लिया था । ’अनुभूति’ कविता में रिश्तों के भीतर प्रेम की खोज और ’हमसफ़र’ कविता में निजता को पा लेने की छटपटाहट साफ है..’फिर इंसान स्वयं में क्या है? यह यक्ष प्रश्न है इसका उत्तर कभी नहीं मिलेगा?
‘दे दो आकाश हमको’ नामक कविता से,काव्य संग्रह के लिए शीर्षक लिया गया है। यही कविता शायद सारी रचनाओं की प्रतिध्वनि है’, ‘इको’ है। ‘खतरा अस्तित्व का’ वाली कविता पढ़कर किसी शायर की एक बात याद आ गई-
“सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा ।
इतना मत चाहो उसे वह बेवफ़ा हो जाएगा॥
’मैं हंसना चाहता हूं’,’हम सबको है नशा’ आदि अच्छी अभिव्यक्तियां हैं। शिल्प औए शैली की बात जाने दें तो मुक्तक अच्छे हैं। पुस्तक का गीत खंड’ इस अर्थ में काफी अच्छा है कि छंद बद्धता,लय,रदीफ़-काफ़िया आदि की रेश्मी डोरी है किन्तु कहीं-कहीं कुछ शब्द खटकते हैं। मसलन ’फिर भी न मिटती प्यास है’ गीत की आखिरी पंक्ति ’सामने आफ़ताब है’ (सूर्य) से प्यास का क्या ताल्लुक? वैसे यह कविता पढ़ते समय इंदु वशिष्ठ की ’सामने गिलास है’वाला गीत ज़ेहन में तैर गया..।
सारांश में निर्मल मिलिंद की यह बात सही है कि’कविता के इलाके में नई रचनाकार का स्वागत’ होना चाहिए। रमा द्विवेदी के “दे दो आकाश” का कलेवर और अन्तर-बाहर सब नयनसुखकारी है। रमा का कवि,स्वतंत्र पहचान वाले विस्तारित नारी जीवन का आकांक्षी है,वह ’मुक्ति’ का नहीं ’भुक्ति’ का पथिक लगता है। तभी तो रमा स्वीकारती हैं कि ’पत्नी की सफलता के पीछे पति का हाथ अवश्य ही होता है,’ जबकि जगत विख्यात बात उलटी है कि हर पुरुष की सफलता के पीछे,स्त्री का हाथ होता है।साभार: डेली हिन्दी मिलाप-१८ दिसम्बर २००५