समीक्षक: प्रो. किशोरीलाल व्यास ‘नीलकंठ’
(पूर्व विभागाध्यक्ष,हिन्दी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद)
’दे दो आकाश’डा. रमा द्विवेदी का प्रथम कविता संग्रह है,यद्यपि बचपन से ही काव्य रचना में लगाव रहा है। इस संग्रह में कुल मिलाकर सौ कविताएं संकलित हैं जो तीन भागों कविता,मुक्तक व गीत में विभक्त हैं। जितना बड़ा आकाश है उतना ही बड़ा कवयित्री का काव्य केनवास है। इतना वैविध्य कि हर एक कविता दूसरी कविता से भिन्न, विषयों का इतना वैविध्य कि नारी की लाचारी से लेकर,ज्ञान-विज्ञान,प्रौद्योगिकी,पर्यावरण,भ्रष्टाचार से लेकर देशभक्ति,अन्तर्मन की गहराई से लेकर आकाश के अनंतता,दीन जनों की विपन्नता से लेकर साधन
संपन्नों की निष्ठुरता,स्वदेश के गावों की सोंधी ‘मिट्टी की गंध’ से लेकर विदेश का एकाकीपन-आश्चर्य होता है, एक ही व्यक्ति इतने-इतने विषयों पर कैसे सोच-लिख सकता है? रमा जी ने अपने आंख,नाक,कान और हृदय को खुला रखा है। भाव-विचार,दृश्य-स्पर्श,गंध, हर्ष-विषाद और न जाने कितने-कितने गहन अनुभूतियों के आवेग कवयित्री के हृदय के ‘क्रुसिबल’ में मिलकर,एक रूप, एक रंग धारण करते रहे और शब्दों के निर्झरों के रूप में फूटते रहे। कविता सहज रूप से आकार ग्रहण करती चली गई-
‘कब दर्द का संवेग उठा?
कब शब्दों का जाल बुना?
कब लेखनी चली कागज पर?
कब पुस्तक का आकार बना’?(पृष्ठ-२३)
रमा जी की कविता सहज कविता है।जब भावों व विचारों का गहन मंथन हृदय में होता है,तो शब्द स्वत: ही फूट पड़ते हैं। पेड़ों पर फूलों के उगने के समान कविता निर्मित होती है। कवयित्री को न राज चाहिए न ताज चाहिए, उसे तो बस आकाश सी उन्मुक्तता और निर्मलता चाहिए-
राज मुबारक तुमको,ताज मुबारक तुमको।
बस चाहते हैं इतना दे दो आकाश हमको॥
रमा जी गहन संवेदनाओं की कवयित्री हैं और उनकी संवेदना का आधार है-उनकी ‘संलग्नता’व ‘प्रेम’। प्रेम ही उनके समग्र काव्य का,अस्तित्व का व अस्मिता का केन्द्र बिन्दु है-
प्रेम दिल की पुकार है,
हृदय का विस्तार है,
स्वप्निल संसार है,
रस की फुहार है,
तन-मन झूम जाता है,
गीत बन जाता है।
कवयित्री नारी स्वावलंबन की हिमायती हैं इसलिए वे लिखती हैं- “मैं नारी जीवन का विस्तार चाहती हूं…..दे दो आकाश हर नारी का संकल्प बन जाए। (पॄष्ठ-१४)
अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान कवयित्री ने दोनों देशों के बीच के अन्तर को गहराई से महसूस किया व अपनी अनुभूतियों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की-”ज़िन्दगी जैसे अपाहिज हो” (पॄष्ठ-४९)”पेड़ बनकर जीना कितना सहज है”(पृष्ठ-५२) जैसी कविता की पंक्तियां गहन अन्तर्दृष्टि को व्यक्त करती है।
कवयित्री कहती है कि कोई वटवृक्ष न बने और दूसरों का विकास ही न रोक दे (पॄष्ठ-७१) रमा जी का मूल स्वर गीत है। संगीत से परिचित होने के कारण इनके गीतों में भावों का,लय का,ताल का व स्वर का अद्भुत समन्वय मिलता है। दृष्टव्य है-”प्यार के झरोखे न होते”(पृष्ठ-१०३),”भूल हम पाते नहीं” (पुष्ठ-१०५) ‘ दे दो आकाश हमको’(पृष्ठ-९७) ‘चाहो हो तुम बुलाओ’(पृष्ठ-९८)आदि गीत माधुर्य एवं कोमलता के निदेशन हैं। अन्य गीत भी बहुत खूब हैं। गीतों के सांचे में ढलकर रमाजी की चिन्ता,चिंतन व विद्रोह का स्वर मधुर हो जाता है। शब्द संगीतबद्ध हो जाते हैं। कवयित्री की भाषा सहज-सरल है।कहीं बनावटीपन दिखाई नहीं
देता। शब्द मानों रिमझिम बरसात की तरह स्वयं बरसते हैं, उनके लिए रुकना नहीं पड़ता। कवयित्री को न संस्कृत का आग्रह है, न उर्दू शब्दों से परहेज। जो भी आया,प्रवाह में एक रूप एक रंग बन गया। इनकी कविताओं में अनुभूति-चिंतन-मनन व अभिव्यक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है। इनके गीतों में ध्वन्यात्मक शब्दों की छ्टा देखने को मिलती है,जैसे-‘पवन चले सनन-सनन’, ‘कंगना करें खनन-खनन,(पुष्ठ-११६) बदलियां, सजनियां,तितलियां जैसे एक ही वजन के शब्दों ने गीतों को बड़ा ही संवेद्य बना दिया है। ‘सांस डगमगाती सी’,‘ बदरी की बिजुरिया सी’,‘अंबर की दुल्हनियां सी’,‘सरगम हुई-हुई’ जैसे प्रयोगों ने रमा जी के गीतों की संगीत्मकता में वृद्धि ही की है।
‘धन्य हो सोनिया’,‘चमचे का कमाल’,जैसी दो चार कविताएं संग्रह को कमजोर बनाती हैं। कहीं-कहीं सपाट बयानी व गद्यात्मकता अखरती है। शतक पूरा करने के आग्रह में संभवत: कुछ कमजोर कविताएं भी आ गईं पर इससे रमा जी की महत्वपूर्ण कविताओं का मूल्य कम नहीं होता। दक्षिण भारत से उठनेवाले नारी स्वरों में रमा जी ने अपनी पहचान बनाई है। रमाजी सतत लिखती हैं और लिखती रहेंगी। निश्चित ही यह अवश्यंभावी है कि कवयित्री उत्तोरोत्तर श्रेष्ठ कविताओं के सोपानों पर चढ़कर उन्मुक्त आकाश में स्वछंद विहार करेंगी।****
-साभार: स्वतंत्र वार्ता,हैदराबाद ,रविवार,२३ अप्रैल २००६
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