माया श्रृंखला-१०(मुक्तक)

१- आधुनिक ये अप्सराएं,
विचरण करें स्वछंद हैं।
तन के कपड़े घट रहे,
अरु आचरण निर्बंध है॥

२- माया के दलदल में जो,
एक बार गिर जाता है।
गुड़ की मक्खी की तरह,
उसमें ही वह मर जाता है॥

३- कैसी है विडम्बना माताओं की,
शिशुओं को भी देती हैं बेंच।
इक जेहाद के नाम पर,
दिल के टुकड़े कर देती हैं भेंट॥

४- दांव पर मुझको लगाया,
क्या मैं कोई वस्तु थी?
राज-पाठ,भाईयों को हार डाला,
धर्म की कैसी यह निर्बल शक्ति थी??

५- अंश और अस्तित्व में,
द्वंद्व जब छिड़ जाता है।
हर सांस को वह बेंच देती,
अंश तब पल पाता है॥

डा.रमा द्विवेदी
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3 Comments Leave a comment.

  1. मुकतक अच्छे हैं। साधुवाद

  2. Respected Dr Sahib
    I am really moved by your simple but direct hiting verses on the malady of the prevailing social order . Please keep on writing and I am sure one day things shall get better and better.Regards
    Dr vishwas Saxena

  3. डा. विश्वास जी,

    आपके अमूल्य विचारों को पढ़ कर हर्षित हूं….हार्दिक आभार सहित…

    डा. रमा द्विवेदी


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