आया बसंत झूम के

आया बसंत झूम के

आया बसंत झूम के,आया बसंत,
अमवा की डाल बैठ कोयल-
कूकती है झूम के आया बसंत,
आया बसंत झूमके,आया बसंत।

गोरी हुई दीवानी है,
पनघट को जानी-जानी है,
गगरी भरी उठाई झूम-झूम के,
आया बसंत झूम के,आया बसंत।

कलियाँ भईं सयानी हैं,
चेहरे पे कुछ रवानी है,
भौरें भी चूमते हैं झूम-झूम के,
आया बसंत झूम के, आया बसंत।

सरसों भी गदराई है,
अलसी भी खिलखिलाई है,
अरहर की जवानी भी आई झूम के,
आया बसंत झूम के,आया बसंत।

नदियाँ भी इठलाई हैं,
सागर से की सगाई है,
लहरों में ज्वार आया झूम-झूम के,
आया बसंत झूम के,आया बसंत।

प्रकृति भी लहलहाई है,
पतझर को दी विदाई है,
अमवा में बौरें आईं झूम-झूम के,
आया बसंत झूम के,आया बसंत।

पिऊ-पिऊ पपीहा कर रहा,
मन मोर का मचल रहा,
प्यासे की प्यास बढ़ गई है झूम के,
आया बसंत झूम के,आया बसंत।

डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

Published in:  on January 31, 2009 at 6:38 pm Comments (9)
Tags:

भारत के राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर आप सभी को अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएँ ।

Published in:  on January 26, 2009 at 11:34 am Comments (3)
Tags:

शून्य की यात्रा

शून्य! जीवन- यात्रा का आरंभ,
जन्म जीवन का अवतरण,
न भाषा,न सामर्थ्य,
चलना, बोलना सब शून्य,
माँ का दुग्ध-पान,
तन-मन की शक्ति की वृद्धि,
माँ की उंगली का सहारा,
शिशु के शून्य से जुड़ जाता है जब,
चलने का सामर्थ्य विस्तार पाता है तब।
शिशु का नि:शब्द शून्य,
जब माँ की तोतली भाषा से,
जुड़ जाता है तब,
उसका शब्द ज्ञान,
वटवृक्ष सा सघन-गहन बन,
दूसरों के शून्य को,
अंकों में बदलने की सामर्थ्य,
पा जाता है,
शून्य से शून्य तक की यात्रा,
कभी न समाप्त होने की यात्रा,
जीवन जब भी जटिल-कठिन लगे,
शून्य में खो जाओ,
शून्य से फिर आरंभ करो,
जीवन को नई ऊर्जा,
नई स्फूर्ति का अहसास,
यह अहसास ही ,
शून्य को अंकों में बदल देता है,
और फिर चरम बिन्दु को पाकर,
फिर शून्य में बदल जाता है,
जीवन का शून्य मृत्यु,
मृत्यु का शून्य जन्म।

डा.रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

दहलीज पर कुछ क्षणिकाएँ

१- दहलीज तक मेरी,
वे आए जरूर थे,
पर जाने क्या हुआ,
रास्ते बदल गए।

२- हम सिसकियाँ भरते रहे,
दहलीज के इस पार,
आँखों में अश्रु लेके,
वे भी चले गए।

३- दहलीज-ए- दायरा,
कुछ इतना बड़ा हुआ,
ताउम्र कैद बन रहे,
उनके इन्तज़ार में।

४- दहलीज के इस पार,
वे भी न आ सके,
हम लांघ कर दहलीज को,
न जा सके उस पार।

डा.रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

Published in:  on January 11, 2009 at 10:34 pm Comments (5)
Tags:

क्षणिकाएँ

१- अपने घर की गली में
खेलते हुए हमारा बचपन
सुरक्षित तो था,
लेकिन आज वह गली भी
अपरिचित,दहशतभरी सी लगती है
कौन जाने? कब किसी की
लाश मिल जाए?

२- कभी अँधेरी गलियों से,
गुजरते हुए भय नहीं लगता था
किन्तु आज
रोशनी से नहाई
सड़कों से गुजरने में भी,
दहशत होती है।

३- एक समय था,जब
घर,खेत, पनघट
और गली में,
बनिताएँ सुरक्षित तो थीं,
किन्तु आज?
घर की पक्की चारदीवारी में भी
वे सुरक्षित कहाँ हैं?

डा.रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

Published in:  on January 6, 2009 at 9:49 pm Comments (4)
Tags: