१- मजबूरियों का,
अन्तहीन सिलसिला,
आत्मदाह के लिए ,
जैसे घी की आहुति।
२- कहते हैं लोग,
आत्महत्या कायरता है,
लेकिन जिल्लतभरी ज़िन्दगी,
उससे भी बड़ी कायरता है|
३- कोई भी सख्स,
यूँ ही आत्यहत्या नहीं करता,
कोई तो मजबूरी होगी?
जो ज़िन्दगी से बड़ी होगी।
४- ज़िन्दगी की मजबूरियों ने,
ज़ज़्बातों और अहसासों की,
हत्या कर दी।
५- मजबूरियों की गहरी खाई,
हर रास्ते की नाकाबंदी,
न फ़रियादी ,
न फ़रियाद सुनने वाला,
तभी उसने आत्महत्या की होगी,
ताकि ईश्वर के दरबार में,
अपनी बेटी के जीवन के लिए,
फ़रियाद तो कर सके।
६- मजबूरियों की आग में,
इतना झुलसी कि-
राख बन गई।
७- आज एक मजबूर माँ ने,
अपने तीन बच्चों सहित,
गहरे पानी में कूद कर,
आत्महत्या कर ली,
ताकि ज़िन्दगी के बाद भी,
उन्हें सुरक्षा दे सके।
८- कोई ऐसा सख्स नहीं,
जहां में,
जो कभी न कभी
मजबूर न हुआ हो।
९- मजबूरियों के मापदंड,
हर किसी के लिए,
अलग-अलग होते हैं।
१०- मजबूरियाँ
तब तक ही सहनीय हैं,
जब तक ज़िन्दगी का,
बलिदान न मांगें।
डा.रमा द्विवेदी
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