कविता कामिनी

कविता कामिनी भी है,
कविता दामिनी भी है,
कविता रूठ जाए गर,
दंशदायिनी भी है।

कविता मनोहारिणी,
कविता शक्तिदायिनी,
कविता जब काली बने,
मुण्डमाल धारिणी।

कविता अर्पण सी सरल,
कविता सलिला सी तरल,
कविता निर्झर सी झरे,
रेत सी जाए फिसल।

कविता पूजा-अर्चना,
कविता है समर्पणना,
कविता आचमन का जल,
कविता मंत्रोच्चारणना।

कविता है श्रृंगार भी,
कविता अश्रुधार भी,
व्यष्ठि से समष्ठि तक,
सृष्टि का आधार भी।

डा.रमा द्विवेदी
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खुदा को मनाने की…..

निगाहें हैं उनमें, कलाएँ भी उनमें,
दिल को लुभाने की अदाएँ भी उनमें ।

किया याद दिल ने जब बुलाने के खातिर,
बहाने बनाने के बहाने हैं उनमें।

कड़ी धूप में जब झुलसता था यह तन,
तपन को बुझाने की घटाएँ हैं उनमें।

तन्हा था यह दिल अब जी न सकेंगे,
हँसकर हँसाने की हँसिकाएँ हैं उनमें।

मौत से लड़ रही थी जब यह ज़िन्दगी,
खुदा को मनाने की सदाएँ हैं उनमें।

डा.रमा द्विवेदी
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Published in:  on March 27, 2009 at 10:46 pm Comments (3)
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युगादि पर्व की हार्दिक मंगलकामनाएँ– डा.रमा द्विवेदी

बेमौत मर गए हम

हर साँस दे दी तुमको,
अपने न बन सके तुम,
माना था तुमको हीरा,
कंकर निकल गए तुम ।

रोपा था प्रेम-पौधा,
सोचा था यह फलेगा,
लेकिन सितम से तेरे,
जड़ से उखड़ गए हम।

देखा था एक सपना,
इक जान बन जिएंगे ,
टूटा है दिल कुछ ऐसे ,
टुकड़े न गिन सके हम ।

जितने करीब आए,
तुम दूर उतने हो गए,
सोचा था क्या-क्या हमने,
बेमौत मर गए हम ।

ख्वाहिश यही थी दिल की
सब तुझपे मैं लुटा दूँ,
बदले हैं तुमने रस्ते,
कुछ भी न कर सके हम।

डा.रमा द्विवेदी
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हाइकु

१- हँसी ठिठोली,
चितचोर की होली
राधा लजाई ।

२- गुलाबी ठंड़
रंगों की बरसात
अंगिया भीगी ।

३- प्रेम का रंग
राधा कान्हा मगन
चूनर लाल ।

४- उगती धूप
गुनगुनाती धरा
आया वसंत ।

५- अमवा डाल
कूकती कोयलिया
प्रिय की प्यास ।

६- मन उदास
प्रिय परदेश
गरजे मेघ ।

७- जिया धड़के
घन-घन बरसे
पलकें बंद।

८- प्यार की प्यास
दहकता पलाश
बसंत साथ ।

९- महुआ फूला
रसभरी गंध
रितु प्यार की।

१०- बदरा घिरे
अंग-अंग महका
मोर चहका।

डा.रमा द्विवेदी
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Published in:  on March 20, 2009 at 6:13 pm Comments (10)
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