दो मुक्तक

आह

किसी की भावनाओं से,कभी खिलवाड़ मत करना,
अगर न कर सको तुम प्यार का इकरार मत करना,
भस्म हो जाता लोहा भी मृतक की आह भरने से,
किसी की आह लग जाए,कभी वो बात मत करना।

दोस्ती

किसी की दोस्ती के बीच काँटे मत बिछाना तुम,
अगर कुछ कर सको करना,सरल राहें बनाना तुम,
बड़ा तकदीर वाला वो जिसे इक दोस्त मिल जाए,
किसी की दोस्ती को देख दिल को मत जलाना तुम।

डा.रमा द्विवेदी
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Published in: on April 23, 2009 at 9:57 am Comments (5)
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कुछ यूँ ही

कहीं अहसास बिकते हैं,
कहीं विश्वास बिकते हैं,
अगर दिल टूट जाए तो,
दीवाने खास बिकते हैं।

कहीं मेंहदी हँसाती है,
कहीं मेंहदी रुलाती है,
पिया का प्यार मिल जाए ,
तो मेंहदी रंग लाती है।

जमाने के हैं क्या कहने,
चुराते आँख का काजल,
अगर हों आँख में आँसू,
तो हँसते हैं वे जीभरकर।

डा.रमा द्विवेदी
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मूर्धन्य साहित्यकार पद्मभूषण विष्णु प्रभाकर जी को श्रद्धांजलि

हिंदी के वयोवृद्ध गांधीवादी मूर्धन्य साहित्यकार एवं ’आवारा मसीहा’ के लेखक पद्मभूषण विष्णु प्रभाकर जी का कल ११ अप्रैल को निधन हो गया है। हिंदी साहित्य जगत की अपूरनीय क्षति हुई है। हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे। ईश्वर उनके शोक-संतप्त परिवार को इस गहन वेदना को सहन करने की शक्ति प्रदान करे। ओम शन्ति शान्ति शान्ति….

डा.रमा द्विवेदी

इश्तहार कर दिया है

वहशी दरिंदों ने जीना दुश्वार कर दिया है,
कच्ची कलियों का खिलना ख़्वाब कर दिया है।

बलात्कार-कत्ल का ऐसा चढ़ा जुनून,
पाक जगहों को भी नापाक कर दिया है।

अब तक भी कैद है वह दुनिया की कारा में,
फिर भी कहते हैं उसे आज़ाद कर दिया है।

शोषण के नए रास्ते हरपल ईज़ाद कर रहे,
बाजार में वह बिक रही सामान कर दिया है।

दुनिया का कारोबार उससे ही चल रहा,
व्यापार का उसे इश्तहार कर दिया है।

होटल,क्लब,बार उसकी थिरकन में झूमते हैं,
तन-मन उसका लूटकर कंगाल कर दिया है।

नग्न तन से यहाँ पर नाचती हैं तारिकाएँ,
स्त्री की अस्मिता पर इक बड़ा सवाल कर दिया है।

डा.रमा द्विवेदी
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Published in: on April 11, 2009 at 10:16 pm Comments (7)
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सरल सा समर्पण

नहीं भाया उनको मेरा मुस्कराना।
दिया आंसुओं का मुझे नज़राना॥

सरल सा समर्पण नहीं भाया उनको,
बनाया है मुझको हँसी का तराना।

नहीं मांगे हमने कभी चाँद-तारे,
दिया एक दिल ना हुए यूँ बेगाना।

चाहत हमारी ना कुछ काम आई,
सीखा उन्होंने बस सितम हम पे ढ़ाना।

दिया सब लुटा बेवफ़ाई पे उनकी,
नहीं आया हमको शम्मा सा जलाना।

डा.रमा द्विवेदी
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Published in: on April 7, 2009 at 10:12 pm Comments (7)
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