आह
किसी की भावनाओं से,कभी खिलवाड़ मत करना,
अगर न कर सको तुम प्यार का इकरार मत करना,
भस्म हो जाता लोहा भी मृतक की आह भरने से,
किसी की आह लग जाए,कभी वो बात मत करना।
दोस्ती
किसी की दोस्ती के बीच काँटे मत बिछाना तुम,
अगर कुछ कर सको करना,सरल राहें बनाना तुम,
बड़ा तकदीर वाला वो जिसे इक दोस्त मिल जाए,
किसी की दोस्ती को देख दिल को मत जलाना तुम।
डा.रमा द्विवेदी
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सत्य कह रही हैं
डॉ. रमा जी,
दोनों ही मुक्तक बहुत अच्छे हैं, मुझे तो कुछ सीख की तरह लगे जो कि हम अक्सर यह महसूस करते हैं हमारे बुजुर्गों से मिलती हुई।
निम्न पंक्तियाँ तो मुझे आज के दौर में बढती हुई खिलंदड़ प्रृवत्ती जिसमे चैट और डेट किसी औजा़र की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं पर करारा प्रहार करती लगती हैं :-
किसी की भावनाओं से,कभी खिलवाड़ मत करना,
अगर न कर सको तुम प्यार का इकरार मत करना,
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
sunder sachhi satya baat keh di,dono bhi muktak sunder hai.
विनय जी,मुकेश कुमार जी एवं महक जी,
उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक आभार….
डा.रमा द्विवेदी
respected DR saheb
you have given a very deep message beautifully in very few lines——-good I appreciate.But unfortunately
the world is such that it does all that which it should not be doing!I request you to come with such a poetry which soothes the souls biten by all those dont’s cited in your poetry I have developed lots of hopes from your mature yet very simple,realistic yet very pleasent style of poetry.मे एक दूह्साहस कर रहा हूँ आपको मेरी एक रचित कविता भेजकर इससे बेहतरीन पंतीयों की अपेक्षा सबके लिए कर रहा हूँ .उससे पूर्व अपना वो निवेदन दोह्रह रहा हूँ की काव्य को मात्र निदानात्मक बनाकर अपनी जिम्मेदारी से मुँह न मोडें बल्कि उसे उपचारात्मक बनाएं .the title of my composition is:
—वो अवश्य सुधरेगा
गर जले कोई दोस्ती से तो उससे दोस्ती की फूवार देना
हो सके तो उसे भी प्यार देना
चूंकि त्रिस्कार जब वो निगलेगा
तो अग्नि और विष ही वो उगलेगा
वक्त जब कुछ गुजरेगा
वो अवश्य सुधरेगा