कुछ रिश्तों के लिए

१- तेरे प्यार का यह कैसा भरम है?
नहीं पास तुम हो,नहीं दूर हम हैं।
नहीं देते हँसने,नहीं देते रोने,
तेरे प्यार का यह कैसा सितम है?

२- नहीं सुनते फ़रियाद कोई हमारी,
रही बेबसी दिल की बेबश बेचारी।
किस ओर जाएं, न सूझे कोई राह,
लिया लूट ज़ालिम ने पूंजी है सारी।

३- मेरे प्यार का क्या कोई मुआयज़ा है?
समझ न सके तुम तो क्या फ़ायदा है?
हो दौलत या जायदाद अर्जी मैं दे दूँ,
तुझे पाने का क्या कोई कायदा है?

४- तेरे मन में क्या है समझ न सके हम,
रहें रात-दिन साथ कुछ न कहो तुम।
कहो क्या करें हम,मिटें फ़ासले सब,
हमें आजमाने की ज़िद न करो तुम।

डा.रमा द्विवेदी
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5 Comments Leave a comment.

  1. अच्छे मुक्तक हैं |
    प्रेमपूर्ण शिकायतों में विश्वास का पुट लिए यह पंक्तियाँ सुन्दर हैं –

    तेरे मन में क्या है समझ न सके हम,
    रहें रात-दिन साथ कुछ न कहो तुम।
    कहो क्या करें हम,मिटें फ़ासले सब,
    हमें आजमाने की ज़िद न करो तुम।

    बधाई
    अवनीश तिवारी

  2. बहुत उम्दा मुक्तक हैं. अच्छे लगे.

  3. respected dr sahib
    A very good picturisation of silent devotion and love,i wish if this feeling goes on in todays world also.Today pure love and dedication is rare to find . A very good poem which shall prevail a message of selfless devotion and love.Regards
    Dr Vishwas saxena

  4. डा. विश्वास जी,

    आपने अमूल्य विचारों से अवगत करवाया इसके लिए दिल से शुक्रिया…स्नेह बनाए रखियेगा…

    डा.रमा द्विवेदी

  5. डा. विश्वास जी,

    आपने अमूल्य विचारों से अवगत करवाया इसके लिए दिल से शुक्रिया…स्नेह बनाए रखियेगा…

    डा.रमा द्विवेदी


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