हमने तो सदा ऐतबार किया था तुमपे,
हमने तो खरा प्यार किया था तुमसे,
तुम्हीं न कर सके इकरार कभी,
हमने तो बार-बार इज़हार किया था तुमसे।
हमारे प्यार की है इल्तिज़ा तुझसे,
हमारे प्यार की है इम्तिहां तुझसे,
हमारा प्यार है गहरा कई समन्दर से,
हमारे प्यार की है इन्तिहां तुझसे।
हमारा प्यार है जहाँ वहीं सबेरा है,
हमारा प्यार है जहाँ वहीं बसेरा है,
हमारे प्यार की खुश्बू ज़मीं से अंबर तक,
हमारा प्यार जहाँ चंद्रमा का ढ़ेरा है।
हमारे प्यार के खातिर ही सूर्य उगता है,
हमारे प्यार के खातिर ही चाँद ढ़लता है,
हमारे प्यार से सारा चमन महक जाए,
हमारे प्यार के खातिर भ्रमर मचलता है।
डा. रमा द्विवेदी
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anupam…..abhinav…..atyant saral aur sahaj kavya
BADHAI!!!
bahut khoob …..badhiyaa laga……
बहुत बढ़िया रचना.
saral aur sahaj kavya..
BADHAI ho Rama ji…Uday
अलबेला जी,अजय कुमार जी, समीर जी एवं उदय प्रताप जी,
रचना पसन्द करने के लिए आप सबका बहुत -बहुत शुक्रिया….
Komal bhavon ki sundar abhivyakti…Badhai.
Submitted on 2009/05/29 at 6:32am
सरल एवं सहज भाव रमा जी। वाह।
प्यार में डूबी रचना पढ़कर उपजा मन में प्यार।
प्यार बिना सूना है जीवन और सूना संसार।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
डॉ रमाजी
आपकी इस रचना को पड़कर उस दौर की यादें ताज़ा हो गयी जब प्यार के मायने केवल पाना ही नहीं होता था .प्यार व्यक्ति को एक उत्कर्ष मानव बना देता था .बहुत बहुत बधाई . अच की आप निरंतर लिख रही हैं , आज की पीडी को कम से कम प्यार का असली अर्थ समझने का मौका तो मिलेगा .हालाँकि में इस अहसास को कभी महसूस नहीं कर पाया किन्तु इतना जानता हूँ की प्यार मनुष्य को बहुत अच्छा बना देता है .प्रणाम सहित
डॉ विश्वास सक्सेना
डा. विश्वास जी,
आपको मैं याद कर रही थी क्योकि इस बार काफी दिनों के बाद आपने प्रतिक्रिया दी है । आपकी प्रतिक्रिया का सदैव इन्तज़ार रहता है क्योंकि मुझे कुछ सीखने को मिलता है..स्नेह बनाए रखियेगा…हार्दिक आभार सहित….सादर..
डा.रमा द्विवेदी