ज़िन्दगी के क़र्ज़ को यूँ चुकायेंगे

दर्द में भी ज़िन्दगी को जीते जायेंगे।
ज़िन्दगी के क़र्ज़ को हम यूँ चुकायेंगे॥

लक्ष्य लेके रास्तों पे बढ़ते जायेंगे,
ढूँढ़ लेंगे मंजिलें या निशां बनायेंगे,
रास्ते की अड़चनों से टकरायेंगे…..
दर्द में भी ज़िन्दगी को जीते जायेंगे॥

रोज नए रिश्ते यहाँ बन तो जायेंगे,
ज़िन्दगी की राहों में वे निभ न पायेंगे,
प्यार हो तो रिश्ते भी गुल खिलायेंगे….
दर्द में भी ज़िन्दगी को जीते जायेंगे ॥

ज़िन्दगी है बेवफ़ा यह हाथ नहीं आयेगी,
साथ में यहाँ से अपने लेके कुछ न जायेगी,
हमसफ़र हो साथ में तो मुस्कायेंगे……
दर्द में भी ज़िन्दगी को जीते जायेंगे ॥

ज़िन्दगी शतरंज भी है,ज़िन्दगी इक गम भी है,
ज़िन्दगी बदरंग भी है,ज़िन्दगी सतरंग भी है,
मुश्किलों में ज़िन्दगी को आजमायेंगे……
दर्द में भी ज़िन्दगी को जीते जायेंगे ॥

डा.रमा द्विवेदी
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गर्मी की ऋतु ऐसी

गर्मी की ऋतु ऐसी
जिसमें साजन भये विदेशी
सारे ए.सी. बन्द पड़े
कैसे कैसे समय कटे।

तन जलता
मन बहुत मचलता
दिन निकले कैसे
शुष्क नदी में
मीन तड़पती
बिन पानी जैसे
ताल तलैया सूख गए हैं
पोखर सब सिमटे।

अंगिया उमसे
बिस्तर चुभता
तन तरबतर हुआ
कहाँ जायें है पीछे खाई
आगे मुआं कुआं
सब सोलह शृंगार व्यर्थ ही
टप टप टप टपके।
कैसे कैसे समय कटे।

–डॉ. रमा द्विवेदी
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Published in: on June 24, 2009 at 10:56 pm Comments (1)
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श्री गुरु ग्रन्थ साहिब को शत-शत नमन

पूज्य श्री गुरु ग्रन्थ साहिब सर्व गुणों की खान है,
खालसा की शान है यह गीता और कुरान है।

सत्य की उपासना, दुखियों की दु:खहर्ता ये,
भेदभाव के बिना सबका यहाँ सम्मान है।
खालसा की शान है यह गीता और कुरान है॥

आन-बान-आस्थाओं के लिए जो मर मिटे,
समानता,समन्वयता,अध्यात्म की पहचान है।
खालसा की शान है यह गीता और कुरान है॥

राजा हो या रंक हो सब साथ में ‘लंगर’ छकें,
समझ सका जो पीर को ये दीनों के भगवान हैं।
खालसा की शान हैं यह गीता और कुरान है॥

शान्ति और अमन की राह दुनिया को दिखलाती है,
आओ करें शत-शत नमन यह सबका गौरवगान है।
खालसा की शान है यह गीता और कुरान है॥

डा.रमा द्विवेदी
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हर ग़म को पचा लेते हैं

दर्द देके वे हमें खुद ही दवा देते हैं,
रूठ जाने पे हमें खुद ही मना लेते हैं।

मेरी जो नाव है पतवार उसमें है ही नहीं,
डूब जाने पे हमें खुद ही बचा लेते हैं।

होगा अन्ज़ाम-ए-मोहब्बत क्या मालूम न था,
देके आवाज हमें खुद ही बुला लेते हैं।

दिल की तन्हाईयों में तेरे ख्वाब बुनते हैं,
अपने सपनों में हमें खुद ही बुला लेते हैं।

मिलन की चाह में दिन-रात हम तड़पते हैं,
इसी उम्मीद में हर दिन को बिता लेते हैं।

तेरी यादों के सिवा पास मेरे कुछ भी नहीं,
तेरे लिए तो हम हर ग़म को पचा लेते हैं।

डा.रमा द्विवेदी
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Published in: on June 5, 2009 at 10:31 pm Comments (11)
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