ए. सी. लाय दईबो सजनवा

तन-मन में लागयो अगनवा
ए.सी. लाय दईबो सजनवा।

जेठ-दुपहरी करेजवा जरावै,
काहै को लाए गवनवा..
ए.सी. लाय दईबो सजनवा।

सोलह श्रृंगार टप-टप टपक रह्यो,
तर-बतर है बदनवा..
ए. सी. लाय दईबो सजनवा।

अंगिया उमसे, सेजरिया चुभै है,
कैसे हुयहै मिलनवा…
ए. सी. लाय दईबो सजनवा।

ताल-तलैया-पोखरवा सिमट गए,
कैसे बुझाऊँ तपनवा..
ए. सी. लाय दईबो सजनवा।

जियरा आवै मूरत बन जाऊँ,
खजुराहो दिखे मोरे तनमा..
ए. सी. लाय दईबो सजनवा।

कामदेव ने प्रत्यंचा चढ़ाई,
गर्मी से निढाल मदनवा…
ए. सी. लाय दईबो सजनवा।

डा.रमा द्विवेदी

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Published in:  on July 25, 2009 at 11:09 am Comments (12)
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यह ज़िन्दगी का फलसफ़ा

ये पेड़ झूम-झूम के ,
कह रहे हैं हमसे कुछ,
समझ सको समझ लो तुम,
ये पेड़ कह रहे हैं कुछ ।

ये हँसते हैं, ये रोते है,
ये खिलते हैं,ये झरते हैं,
इन्हें भी दर्द होता है,
जब अपनों से बिछुड़ते हैं ।

इन्हें भी भूख लगती है,
इन्हें भी प्यास लगती है,
वंशज बचाने वास्ते,
नस्लों की चिन्ता डसती है।

पथिक को रोककर कहें,
जरा सा रुक-ठहर तो लो,
हमारी भी तो कुछ सुनो,
अपनी भी कुछ कहो ।

पथिक को छाँव देने को,
ये हर घड़ी तैयार हैं,
प्रतिदान चाहें इतना ही,
हम तो तुम्हारे यार हैं ।

समय की मार को भी ये,
हँसते-हँसते सहते हैं,
यह ज़िन्दगी का फलसफ़ा,
यह हर किसी से कहते हैं।
डा. रमा द्विवेदी
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रेखाओं पर कुछ क्षणिकाएँ

१- रेखाओं की भी,
होती है एक इबारत,
पढ़ सको तो पढ़ लेना ।

२- रेखाएँ!
सोच-समझ कर खींचना
ये अभिशाप भी बन सकती हैं
और
वरदान भी ।

३- हस्त रेखाएँ,
बताती हैं भाग्य,लेकिन
क्या कोई सच में,
इन्हें पढ़ पाया है।

४- भाग्य रेखाएँ
यदि कोई पढ़ पाता
तब हर किसी का भाग्य,
सौभाग्य होता|

५- रेखाओं का समीकरण,
अक्षर की व्यतुपत्ति,
शब्द निर्माण,
और शब्द रचते हैं,
गीता,पुराण,
महाकाव्य और महाभारत।

६- एक लक्ष्मण रेखा,
क्या लांघी?
सीता हरण हो गया,
भयंकर राम-रावण युद्ध,
एक युग का अन्त।

७-रेखाओं का जाल,
उलझती जीवन शैली
का मापदंड।

८- समानान्तर रेखाएँ
किसी को काटती नहीं,
इसलिए जीवन का बीजगणित,
अर्थवान हो उठता है।

९- मेहनत!
भाग्य रेखाओं को,
नया मोड़ दे देती है।

१०- जीवन का समीकरण,
सिर्फ
भाग्य रेखाओं से नहीं बनता।

११- रेखाएँ!
सीधी,आडी,तिरछी,
खींच कर देखिए,
कभी- कभी,
कुछ महत्वपूर्ण बन जाता है।

१२- रेखाओं को यूँ ही
व्यर्थ मत करो,
क्योंकि यही रेखाएँ
होती हैं सभ्य संस्कृति
और सभ्य समाज की धरोहर।

१३- संसार भर की
भाषाओं एवं लिपियों का विकास
रेखाओं के संतुलन पर टिका है।

१४- रेखाएँ ,
नदी के दो किनारे जैसी हों,
और रिश्तों के बीच बहती रहे,
मिठास, स्नेह और आत्मीयता।

१५- रेखाओं की संवेदना को,
कठोर न बनने दें,
नहीं तो,
मनुष्यता नष्ट हो जाएगी।

डा.रमा द्विवेदी
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