खुद को मिटाती चली गई

खुद को मिटाती चली गई
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई।
दस्तूर-ए-दुनिया के निभाती चली गई॥
चारो तरफ रिवाज़ों की भीड़ है खड़ी,
रस्में-वफ़ा मैं फिर भी निभाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
चाहत में तेरी खुद को मिटा डाला है मैंने,
तेरे लिए हर ग़म को उठाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
जब भी मेरे दिल ने तुझे याद किया है,
मैं आँसुओं में खुद को डुबाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
तेरे बिना यह ज़िन्दगी बेज़ान हुई है,
हर साँस का मैं बोझ उठाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
दीवानगी है दिल की यह,दिल्लगी नहीं,
दीवानगी,जो होश उड़ाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
डा. रमा  खुद को मिटाती चली गई

तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई।
दस्तूर-ए-दुनिया के निभाती चली गई॥
चारो तरफ रिवाज़ों की भीड़ है खड़ी,
रस्में-वफ़ा मैं फिर भी निभाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
चाहत में तेरी खुद को मिटा डाला है मैंने,
तेरे लिए हर ग़म को उठाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
जब भी मेरे दिल ने तुझे याद किया है,
मैं आँसुओं में खुद को डुबाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
तेरे बिना यह ज़िन्दगी बेज़ान हुई है,
हर साँस का मैं बोझ उठाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
दीवानगी है दिल की यह,दिल्लगी नहीं,
दीवानगी,जो होश उड़ाती चली गई।
तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥

डा. रमा द्विवेदी

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Published in:  on October 19, 2009 at 11:05 am Comments (7)
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7 Comments Leave a comment.

  1. बहुत सुन्दर गजल है बधाई स्वीकारें।

  2. दीवानगी है दिल की यह,दिल्लगी नहीं,
    वाकई दिल की दीवानगी कोई दिल्लगी नही है
    बहुत खूबसूरत

  3. चारो तरफ रिवाज़ों की भीड़ है खड़ी,
    रस्में-वफ़ा मैं फिर भी निभाती चली गई।
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥

    अस्तित्व का समाहित हो जाना ही है त्याग,
    प्रेम यही मांगता है, जैसे नदी का सागर मे समाहित हो जाना
    बहुत सुन्दर रचना बधाई, प्रणाम

  4. दीवानगी है दिल की यह,दिल्लगी नहीं,
    दीवानगी,जो होश उड़ाती चली गई।
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥
    waah dil ki sachhi aawaz,sunder

  5. an excellent piece of work. bahut sunder hei

  6. वाकई क्या खूब दीवानगी है…
    जिसे हम कल्पनालोक में तो जीते हैं…रमे रहते हैं…
    पर यह दुनिया…उफ़…कयामत है…

  7. परमजीत जी, एम.वर्मा जी,ललित शर्माजी,महक जी,केवल धींगरा जी एवं रवि कुमार जी,

    आप सबका दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ….अपने अमूल्य विचारों से आगे भी अवगत कराते रहियेगा…

    – डा.रमा द्विवेदी


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