प्रपंच और चापलूसी

 

१-      प्रपंच का भी आज आधुनिकरण हो गया है

इसलिए चौपाल छोड़ नेट-ग्रुप में हो गया है,

यहाँ पर भी है अँधेर नगरी का चौपट राजा,

टके सेर भाजी और टके सेर खाजा हो गया है।

२-    प्रणाम और चापलूसी कर प्रशंसा पा लेते हैं,

खुद को महाकवि मान अनुशंसा कर लेते हैं,

कूपमण्डूक की तरह टर्र-टर्र करते हैं मित्रों केलिए

काल की कसौटी में खुद को दफ़न कर लेते हैं।

३-    तू मेरी जय बोल मैं तेरी जय बोलूँगा ,

यही आधुनिक कवियों का नारा है,

चार महारथी मिल जो  आपको मंच दे दे,

उसी की सत्ता मान आप करते जयकारा है।

४-  कुकरमुत्ते की तरह गली-गली कवि उगने लगे हैं,

इन्सटेंट कविता लिख ओशो कवि बनने लगे हैं,

कालिदास ने तो गिनती के ही ग्रन्थ रचे जीवन भर में

ये तो वर्ष के तीन सौ पैंसट दिन कविता लिखते हैं।

५-   ब्लाग पर प्रशंसा पा लेना सबसे आसान है,

‘ वाह-वाह’ लिख सबको भेजे वही महान है,

फिर वही कमेंट्स आपको मुफ़्त में आ जायेंगे,

और  सबकी नज़र में आप बन जाते विद्वान हैं।

डा. रमा द्विवेदी

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Published in:  on November 26, 2009 at 10:09 pm Comments (7)
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अलविदा ज़िन्दगी

हम भी हरे थे,चुलबुले थे,

ज़िन्दगी के हर रंग जिये थे

आज हम मुरझा गये हैं

दुख के बादल छा गये हैं।

ज़िन्दगी की शाम में

देगे नहीं कोई सदा हम,

आखिरी लम्हें तो जी लें

कल कहेंगे अलविदा हम।

शिकवा नहीं कोई किसी से

सबको भी आना यहीं हैं।

आज जी भर कर विलस लो

छोड़ सब जाना यहीं है।

ज़िन्दगी  का चक्र है यह,

घूमकर आता यहीं हैं।

आदि  सबका एक है,

अंत भी सबका वही है।

हर जगह खुशियाँ बिखेरो

ज़िन्दगी का  मंत्र हो यह।

याद दुनिया में रहें ,

ज़िन्दगी का अन्त हो यह।

डा. रमा द्विवेदी

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समझौता भाता नहीं।

 

जब किसी से जुड़ता है दिल मेरा

दिल दीवानगी को पार कर जाता है।

और जब टूटता है दिल मेरा,

दिल  दुख की दीवानगी में डूब जाता है।

क्या करें इस दिल का,

समझौता इसे भाता नहीं।

और दिल की उन गहराईयों तक,

समझने के लिए कोई आता नहीं।

इस दुनिया में दिल की बात करना,

खुद को भरमाना है।

क्या करें वे जिन्हें कुछ न मिले,

इसे भ्रम से ही बहलाना है।

प्रेम की स्वार्थलोलुपता देख,

मेरा दिल दहल जाता है।

पर जिन्हें कुछ नहीं मिलता,

उनका दिल जैसा भी हो, बहल जाता है।

दिल का जुड़ना तो एक क्षण में पूर्ण होता है,

जहाँ सब कुछ लुटा देने की भावना का प्रवाह होता है।

निकटता साथ-साथ रहने से नहीं होती है,

वह तो सिर्फ़ थोपा हुआ एक लोकाचार होता है।

डा. रमा द्विवेदी

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