१- ढोती है रात
मनुज की पीडाएं
भोर की आस |
२- मुखौटे लगा
खोने को हैं बेताब
चैटिंग – यार |
३- हैं अनजान
अडोस-पड़ोस से
सर्फिंग -प्यार |
४- ऊषा मुस्काई
भौंरे गुनगुनाए
ताजगी आई |
५- आँगन धूप
भागती फिर रही
छत-मुडेर |
६- आसमां झुक
धरा से कहता ये
तुझ से ही मैं |
७- ऊंघती आँख
अँधेरे सन्नाटे में
आल्हा सुने है |
डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved
आसमां झुक
धरा से कहता ये
तुझ से ही मैं |
वाह …बहुत खूब कहा है आपने …आभार ।
हायकू की निश्चित सीमा में सुन्दर भाव !
सदा जी व वाणी गीत जी ,
रचना पसंद करने के लिए हार्दिक आभार …..