१- उनका मन
ज्यूं पुरइन पात
भीगता नहीं |
२- सोने- सी भोर
सिंदूरी -सी निखरी
नई -नवेली |
३- मेघों के घेरे
चन्दा के आस-पास
मन मचले |
४- बंशी के स्वर
क्यों काँप रहे आज
राग क्यों रूठा ?
५- सीप -बसेरे
रेत के घरौदों में
मोती न मिले |
६- नेह -निबाह
न होता अँधेरे में
उजाले चाहे |
७- रूप आभा से
रोशन हो अन्धेरा
सुखानुभूति |
८- टिका लूं पैर
ठोस धरातल पे
तब तो उडूं |
९- बदल देंगे
गुरुत्वाकर्षण को
सपने मेरे |
१०- आत्मा में डूब
चेतना की साधना
तपस्यारत |
डा. रमा द्विवेदी
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मेघों के घेरे
चन्दा के आस-पास
मन मचले |
-प्रकृति के माध्यम से प्रेम की सुखद अनुभूति का सहज चित्रण !
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सीप -बसेरे
रेत के घरौदों में
मोती न मिले |
-यही जीवन है , कुछ पाने के लिए आदमी का प्रयास जारी है ।
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नेह -निबाह
न होता अँधेरे में
उजाले चाहे |
-सही कहा आपने , स्नेह के निर्वाह ए लिए मन में उजाला होना ज़रूरी है !
विस्तृत विवेचन के लिए हार्दिक आभार …स्नेहाशीष की आकांक्षा में ….
आदरणीय रमाजी नमस्कार
गागर में सागर को चरितार्थ करती आपकी हाईकु शैली में की गई रचनाएं मानव जीवन के विभिन्न आयामों को सजीव कर देती हैं |सीमित शब्द असीमित अहसासों को इस तरह उकेर सकते हैं ,यह अनुभव चमत्कृत कर देता है और आपकी सृजनात्मकता के प्रति नतमस्त कर देता है |
सादर
behad sunder
दिव्यांश जी ,स्नेहिल- भावनापूर्ण विचार प्रेषित करने के लिए दिल से शुक्रिया ..
हार्दिक आभार,महक जी