अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

होली गीत

     होली का दिन है आज,

     होली कैसे मनावै?

      भाई-भाई में जंग छिड़ी है,
      खून की बढ़ी ऐसी प्यास….
      होली कैसे मनावै।

      कच्ची कलियां सहमी-सहमी लागें,
      अहसासों की पड़ी है लाश…..
      होली कैसे मनावै।

      गांव सुलग रहे,नगर सुलग रहे,
      सुलग रहा है संसार….
      होली कैसे मनावै।

      झांझ मंजीरा थाप मृदंग पर,
      सबहीं पड़े हैं उदास…
      होली कैसे मनावै।

      होली के सब रंग बदल गए,
      बदल गए हैं अंदाज़….
      होली कैसे मनावै।

      रंग के बदले कीच उछाले,
      शब्दों का छिड़ा संग्राम….
      होली कैसे मनावै।

      होली फीकी है प्रेम रंग बिन,
      राधा कान्हा भी उदास….
      होली कैसे मनावै।

      डा. रमा द्विवेदी

 

March 21, 2008 Posted by ramadwivedi | गीत | | 2 Comments

खुद को छुपा रहा है तू

          मेरे ही घर से मुझ को लेके जा रहा  है तू
          रखोगे ख्याल हरदम वादे भी कर रहा है तू।

          जब तेरे घर में आकर हम हो गए तुम्हारे,
          बदला मिज़ाज़ तेरा मुझको सता रहा है तू।

          भूले वो अर्चनाएं , भूले वो सात फेरे .
          प्रणय के इस अनुबंध को झूठा बता रहा है तू।

          तेरे बदलते रूप का कारण समझ सके न हम,
          गिरगिट सा रंग बदलकर खुद को छुपा रहा है तू।

          अहसास को हमारे पलभर में रौंद डाला,
          पत्थर बना के अब क्यों अरमां जगा रहा है तू।

            डा. रमा द्विवेदी  

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February 21, 2008 Posted by ramadwivedi | गीत | | 8 Comments

स्वागत तेरा नववर्ष

         स्वागत  तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥         
         आगमन पर तेरे जन-जन के मन में हर्ष है।

         सूर्य अपनी ऊष्मा धरती को है दे रहा
         चांद अपनी चांदनी को नेह से भिगो रहा।
         तारे सलाम कर रहे चहु ओर जैसे पर्व है,
         स्वागत तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥

         नेह का अनुबंध सृष्ठि का प्रथम अध्याय है,
         इंसान की इंसानियत भी प्रेम का पर्याय है,
         प्रेम से ही ज़िन्दगी है, प्रेम से उत्कर्ष है
         स्वागत तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥

         पर्वतों की अलसाई भोर चुपके से कुछ कह रही,
         लग रहा ज्यों प्रकृति-दुल्हन अंगड़ाई ले उठ रही,
         पवन करे अठखेलियां ज्यों रच रहा नवसर्ग है।
         स्वागत तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥

            डा. रमा द्विवेदी

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January 15, 2008 Posted by ramadwivedi | गीत | | 2 Comments

नववर्ष फिर आया है

    एक वर्ष भी बीत गया, नया  वर्ष फिर  आया है,
    कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है।

    कितने पल हमसे रूठ गए,कितनी विभूतियां खोई हैं,
    कितने शूल चुभे अन्तस में,कितनी मालाएं पिरोई हैं,
    मंदिर में कुछ पल बीत गए,श्मशान से कभी बुलावा है।
    कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पया है॥

    भावों के आलोड़न से मन-आंगन में रची रंगोली,
    इक पल सेज सजी दुल्हन की,दूजे पल मेंहदी धो ली,
    सुख-दु:ख के बैठ हिंडोले  नियति ने क्रम दोहराया है।
    कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है॥

    जैसे भी कट गया सफर,क्या कल भी ऐसा कट पाएगा?
    रिश्तों की बगिया में क्या फिरसे स्नेह सुमन खिल पाएगा?
    फूल खिला जो डाली  पर पतझड़ नें उसे मिटाया है।
    कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है॥

    नाहक झगड़ा करते हम,कुछ भी अपना नहीं यहां,
    चन्द दिनों का अभिनय कर लें,क्या जाने कल कौन  कहां?
    सांसों की लय कब टूटेगी यह जान न कोई पाया है?
    कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है॥

     डा. रमा द्विवेदी

 

 

December 29, 2007 Posted by ramadwivedi | गीत | | 4 Comments

हमारा दम निकलता है

           किसी को क्या बताएं कब हमारा दम निकलता है,
           अगर उनको भुलाएं  हम हमारा दम निकलता है॥

           यह उनके रूप का जादू पिये बिन ही बहकते हम,
           नशा गर यह न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥

           ये आंखें बोलतीं उनकी,जुबां रस घोलती उनकी,
           अगर ये मौन हो जाएं हमारा दम निकलता है॥

           घनेरी काली जुल्फ़ों संग नहीं है धूप की चिन्ता,
           घटा बन गर बरस जाएं हमारा दम निकलता है॥

           ये मीठे से गिले-शिकवे बहुत नीके लगें मन को,
           मगर जब रूठ जाएं ये हमारा दम निकलता है॥

           अदा प्यारी लगे उनकी इक सदा पर दौड़े आते है,
           सहारा गर न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥

           अंधेरे गहरे सागर में पुतलियां मीन सी तिरतीं,
           कहीं जब चांद न पाएं हमारा दम निकलता है ॥

               डा. रमा द्विवेदी

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October 19, 2007 Posted by ramadwivedi | गीत | | 9 Comments