दो मुक्तक

    १-   जरा-मरण के बीच में
          दूरी है इक साँस की।
          साँस रुकी तो मृत्यु मिलेगी,
          मृत्यु रुकी तो ज़िन्दगी॥

   २-   ज़िन्दगी के रंगों में
          इक रंग मुझको भा गया।
          जीते-जीते ज़िन्दगी पर ,
          प्यार मुझको आ गया॥

       डा. रमा द्विवेदी
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धूप पर कुछ मुक्तक

धूप संग साया चला,
पर संग में कोई न था।
छांव के संग भीड थी,
पर संग में साया ना था॥

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धूप से ही हिम गला,
धूप से बादल बना।
धूप की ही तपिश से,
हिया धरती का दरक गया॥

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धूप की ही उष्णता में,
बीज भी अन्कुर बना।
धूप की मनमानी से,
अस्तित्व भी उसका मिटा॥

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धूप तडपाती भी है,
धूप तरसाती भी है।
शीत से अंग-अंग गले जब,
धूप सहलाती भी है॥

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ज़िन्दगी के मंच में,
व्यंग्यों की धूप तेज है।
मरहम लगा लगा हंसे,
शब्दों का हेर-फेर है॥

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धूप की विद्रूपता से,
खुद को बचाइयेगा आप।
वर्ना जल करके कहीं,
पा जाओ न कैन्सर का शाप॥

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धूप के इस खेल में,
कल की नहीं मुझको खबर।
आज है अस्तित्व मेरा ,
कहीं न जाऊं कल बिखर॥

 

डा. रमा द्विवेदी

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कुछ मुक्तक (ज़िन्दगी पर)

पद को पाने के लिए
साज़िश हुई है ज़िन्दगी ।
किस तरह सिक्का जमे,
दूभर हुई है ज़िन्दगी ॥

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शकुनी की चालाकियां
आज भी तो कम नहीं ।
भीष्म की चतुराइयों में भी,
सिर झुकाती ज़िन्दगी ॥

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आंख से सब देखते हैं,
पर कुछ नही  कह पाते हैं ।
सच्चाई का दांव भी,
हार जाती ज़िन्दगी ॥

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दुर्योधन की महत्वाकांक्षाएं
आज भी हर घर में हैं ।
कर्ण की अहंकारिता
नष्ट करती ज़िन्दगी ॥

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दु:शासन आज भी तो
द्रोपदी का चीर हैं हर रहे ।
इक्कीसवीं-सदी में भी
क्यों नग्न होती ज़िन्दगी ॥

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द्रोपदी के अपमान का
प्रतिशोध है यह ज़िन्दगी ।
युद्ध की संभावना का
दंश है यह ज़िन्दगी ॥

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धृतराष्ट्र की धृष्टता की ,
मोहताज़ है यह ज़िन्दगी ।
जीत में भी हार का
अहसास सी है ज़िन्दगी ॥

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भारत की आजादी ने
नारियों को क्या दिया ?
भ्रूण -हत्या ,वधु-हत्या,,नग्न तन -मन
यही सब देती रही है ज़िन्दगी ॥

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आधुनिक सभ्य समाज में भी,
नारी इन्सान न बन सकी,
मां,बहिन, पत्नी,प्रेयसी बन ,
बस पिस रही है ज़िन्दगी ॥

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कौन सी यह सभ्यता है,
कुछ समझ आता नहीं।
खुश यहां कोइ नहीं ,
बस मिट रही है ज़िन्दगी ॥ 

डा. रमा द्विवेदी

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