July 18, 2007 at 10:17 am (मेरी कुछ कहानियां)
बड़े पिता जी का पत्र आया था। पत्र में लिखा था कि संध्या बहुत चिड़चिड़ी हो गई है। बात-बात पर झगड़ा करती है। किसी से ठीक से बात ही नहीं करती। हर समय लड़ना-झगड़ना,रोना -धोना मानो यही उसकी दिनचर्या बन गई है।मैं बहुत दुखी हूं ,समझ में नहीं आ रहा कि इसके जीवन को ठीक से व्यवस्थित करने के लिए ऐसा क्या करूं कि वह बाकी का जीवन खुशी से गुजार सके। तुम ही कुछ उपाय बताओ। पत्र पढ़कर मैं सोच में डूब गई।
मैं अतीत की अतल गहराईयों में झांकने लगी।तब मैंने पाया कि संध्या जब नौ बरस की थी तब बड़ी मां बहुत बीमार रहती थीं। दिन में कई-कई बार उन्हें हिस्टीरिया के दौरे पड़ते थे। गांव में डाक्टर तो थे नहीं हां जो भी नीम-हकीम दवा बताते की गई। एक दो बार शहर के डाक्टरों को भी बताया गया,उन्होंने कहा कि ज्यादा मानसिक तनाव की वजह से ऐसा होता है। इन्हें आराम की शख्त जरुरत है। समय समय पर चेक-अप के लिए लाएं और जो दवाई दी गई है उसे समय पर देते रहें और तनाव से दूर रखें।
घर पर कोई और औरत तो थी नहीं और बड़े पिता जी तो अक्सर खेती-बाड़ी के काम-काज और राजनीति में उलझे रहते।मां तो अक्सर बिस्तर पर पड़ी रहती किन्तु घर के काम-काज का भार नन्हीं सी जान संध्या पर आ पड़ा। खाना पकाना,बरतन धोना, और घर बुहारना इन्हीं सब कामों में दिन निकल जाता अत: संध्या की पढ़ाई बन्द हो गई। दुर्भाग्यवश संध्या पांचवीं तक भी न पढ़ सकी। वैसे भी गांव में प्राइमरी स्कूल ही था इसलिये ज्यादा पढ़ाई की तो संभावना भी नहीं थी। मां अपनी बीमारी से लाचार थी और पिता जी जीवन की अन्य समस्याओं को सुलझाने में उलझे रहते। संध्या की पढ़ाई की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। बड़ी मां को सिर्फ अक्षर ज्ञान ही था अत: वे इतना ही सोच पाती थी कि पढ़ लिख कर नौकरी थोड़ी ही करनी है। घर का चौका-चूल्हा ही तो करना है इसलिये संध्या की पढ़ाई बंद होने का उन्हें लेशमात्र भी दु:ख नहीं हुआ।
“समय ढ़लता रहा और संध्या का कोमल बचपन चूल्हे की भेंट चढ़ गया। सपने जन्म ही न ले सके उड़ान भरनें की बात कौन कहे?”लेकिन सोलवां बसन्त पार करते-करते उसके दिल में यह बात अवश्य ही घर कर गई कि सुख तो अब शादी के बाद ही मिल सकता है,वो भी तब अगर शहर में शादी हुई तो? गांव में त्तो ऐसे ही काम करना पड़ेगा और उसका मन काम से ऊब चुका था। उसकी इस सोच में उसकी सहेली सुदामिनी की सलाह ने आग में घी का काम किया। जब बड़े पिता जी ने उसका रिश्ता एक अच्छे खाते -पीते घर में तै कर दिया किन्तु लड़के का रंग काला था। जब संध्या ने यह सुना तो उसने रो-रोकर घर भर दिया कि मैं काले लड़के से शादी नहीं करूंगी और मर जाने की धमकी दे डाली। आखिर में पिताजी ने रिश्ता तोड़ दिया। जब दूसरी बार पिताजी ने अच्छा लड़का और परिवार देखकर बात तै कर दी तब संध्या से अपने गांव की एक लड़की ने जो उसी गांव में ब्याही थी,उसने कहा कि वह उसके घर दान लेने आया करेगी क्योंकि उसके होने वाले ससुराल के लोग उसके घर पूजा करवाने आते हैं बस इतनी बात संध्या को चुभ गई और उसने शादी करने से विद्रोह कर दिया। इसी बीच उसकी सहेली ने उसके मन में यह बात डाल दी कि गांव में कभी शादी मत करना जीवन भर ऐसे ही काम करना पड़ेगा। उसकी यह बात उसे बहुत ठीक लगी।
अपनी इच्छा पूर्ति न होते देख उसने मां से दोटूक शब्दों में कहा”मां मैं शहर में शादी करूंगी चाहे वह कुली ही क्यों न हो” ?
मां बेटी की यह बात सुनकर अवाक रह गई,उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ” उन्होंने कहा यह तू क्या कह रही है? तुझे कुछ होश है”?
संध्या ने अपनी बात बड़े आत्म-विश्वास से दोहराई-” मैं गांव में शादी नहीं करूंगी अगर शादी करूंगी तो शहर में नहीं तो मैं आत्म हत्या कर लूंगी”।
मां ने उसे बहुत समझाया-बुझाया लेकिन संध्या थी कि अपनी जिद पर अड़ी रही। मां अब क्या करती? बेटी पर तरस आया और उन्होंने पिता जी से संध्या की सारी बात कह दी। पहले तो पिताजी बहुत नाराज हुए,कई दिन तक घर में तनाव रहा। बेटी को ऊंच-नीच सब प्रकार से समझाने की कोशिश की लेकिन संध्या टस से मस न हुई। आखिर में पिताजी ने लड़के वालों को मना कर दिया।
कुछ ही समय बाद गांव के तिवारी जी की बेटी रन्नो की शादी हुई । बारात शहर से आई थी। संध्या भी इस शादी को देखने गई। सभी बाराती साफ़-सुथरे, सुन्दर वेशभूषा में थे। बातचीत में तो शहर के लोग शिष्ट और चतुर होते ही हैं। संध्या ने देखा कि रन्नो की शादी में सुन्दर गहने एवं साड़ियां आईं हैं। दूल्हा भी बहुत सुन्दर और स्मार्ट है। बस यह सब देखकर उसकी इच्छा शहर में शादी करने की और भी दृढ़ हो गई।
ज्यादा दुनिया तो देखी नहीं थी। छोटी सी बुद्धि में आगे कुछ सोचने-समझने की शक्ति नहीं थी। संध्या गोरी, तीखे नाक-नक्श,छरहरा बदन,कुल मिलाकर उसकी आकर्षक छबि थी और देखने वाले भी सहज ही आकर्षित हो जाते। इसी विवाह में किसी ने संध्या को देखा। रूप-रंग पसंद आने के कारण रन्नो के घरवालों से पता करके रिश्ता लेकर पिताजी के पास आए। चूंकि रिश्ता रन्नो के ससुराल वालों के माध्यम से आया था इसलिए पिता जी को कोई शक नहीं हुआ। सीधे-सादे पिता जी को क्या पता था कि इसमें कुछ छ्लावा भी हो सकता है फिर अपनी बेटी की इच्छा भी तो शहर में शादी करने की थी इसलिए पिताजी ने ज्यादा छान-बीन नहीं की ।बस एक बार नागपुर जाकर लड़का और उसका घर देख आए। शहर के लोग ठहरे चालाक उन्होंने किसी और की दुकान को अपना कह कर बता दिया। पिता जी को सब ठीक लगा इसलिए सगुन देकर वापस आ गये।
लड़के वालों ने सिर्फ एक ही महीने में शादी करने की बात रखी। शादी की तैयारियां शुरू हुईं और एक दिन संध्या की शादी बड़ी ही सादगी से संपन्न हो गई।” संध्या बहुत खुश थी कि उसकी सबसे बड़ी साध पूरी हो गई। उसका मन कल्पना लोक में विचरण कर रहा था”। आखिर में वो समय भी आ गया जब संध्या की विदाई मां-पिता जी ने बड़े ही भारी मन से कर दी। जब संध्या ससुराल पहुंची और देखा कि घर में ऐसा कुछ नहीं है जिसे देखकर खुश हुआ जा सके। संध्या को शीघ्र ही पता चल गया कि पति शराबी है और निठल्ला भी है।न कोई नौकरी न व्यापार । बस एक पुराना घर है जिसका एक पोरशन किराए पर है उसी से बहुत मुश्किल से घर चलता है। बूढ़ी मां और एक कुंवारी बहन शादी के योग्य है। तीन बहनों की शादी बहुत पैसों वालों के घर तब हो गई थी जब उनके पिता जी जिन्दा थे क्योंकि तब उनके पिताजी का अच्छा व्यापार था और अच्छा नाम भी था। उनके न रहने पर लड़के ने सब गंवा दिया शराब के नशे में। कितना ही अथाह धन क्यों न हो अगर खर्च ही खर्च किया जाय तो तिजोरी भी खाली हो जाती है।यही हाल यहां हुआ। कभी -कभी बहनें पैसों से इनकी मदद कर देतीं थीं लेकिन किसी की मदद से कब तक चल सकता था? तीनों बहनों ने मिल कर छोटी बहन की शादी अच्छा घर-वर देख कर करवा दी किन्तु फिर इन लोगों की आर्थिक मदद करना बन्द कर दिया। पति के दुर्व्यवहार और कुछ काम न करने से संध्या बहुत दुखी रहने लगी। उस पर सास यह ताना देती कि उनका बेटा उसके आने से ही बिगड़ गया है। सास के ताने सुन-सुन कर संध्या यह सोचती कि जो कभी सुधरा ही नहीं था वह बिगड़ कैसे गया?इन्हें अपने बेटे के लक्षण मालूम थे फिर भी इन्होंने छलावे से झूठ बोल कर शादी करवा दी ।यह सोच कर वह बहुत दुखी और उदास रहने लगी कि वह और उसके माता-पिता बुरी तरह छले गए हैं।उसका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरने लगा। ऐसे ही करीब पांच वर्ष बीत गए लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया। किस मुंह से बताती क्योंकि वह खुद ही तो शहर में शादी करना चाहती थी। पहले ही उसने मां और पिता जी को बहुत कष्ट दिये हैं अब और नहीं देगी। शायद इसी लिए भगवान ने उसे सजा दी है जो ऐसा पति मिला,अब यही मेरा प्रारब्ध है। नियति को कौन टाल सकता है? अब मुझे इसी नर्क में जीना है अब मैं किसी को दुख नहीं दूंगी। दुख और संघर्षों का प्रभाव तो स्वास्थ्य पर निश्चित ही पड़ता है। संध्या के मलिन मुख और दुबले शरीर को देख कर मां-पिताजी समझ गए कि वह खुश नहीं है,कोई बड़ा गम है जो उसे अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है? एक दिन पिता जी ने बड़े प्यार से उसे अपने पास बिठाकर अपनी कसम देकर पूछा “सच सच बताना कि तुम वहां खुश तो हो ना”? संध्या थोड़ी देर तो चुप रही,उसके मन में द्वन्द्व का तूफ़ान उठा कि बताए या नहीं ?लेकिन उसका दर्द भी असहनीय होता जा रहा था इसलिए यह सोचकर कि मां और पिता जी तो अपने हैं वे अवश्य उसका दर्द समझेंगे । वह कुछ कहना चाहती थी पर कंठ से शब्द नहीं फूट रहे थे। आखिर में दर्द आसुंओं में बह निकला। संध्या फफक-फफक कर रो पड़ी। पिता जी ने उसे प्यार से थपकियां देते हुए गले से लगा कर कहा”पगली इसमें रोने की क्या बात है? हम हैं ना तेरे दुख को समझने के लिए। संध्या ने आपबीती सब कुछ बता दिया। पिताजी और मां अवाक रह गए। उन्हें लगा कि वे बुरी तरह ठगे गए हैं। मां-पिता जी का दुख संध्या से देखा नहीं गया और उसने कहा कि वे उसकी चिन्ता न करें ।वह कैसे भी रह लेगी किन्तु कोई भी माता-पिता बेटी का दुख जानकर चुप कैसे बैठे रह सकते हैं? पिताजी ने दमाद को समझाया-बुझाया लेकिन उसने उनकी एक बात न सुनी। शराब की बुरी लत जो पड़ चुकी थी जिसने उसकी बुद्धि को भी नष्ट कर दिया था। अंत में जब कोई समाधान न रहा तब हारकर पिताजी संध्या को हमेशा के लिए घर ले आए”।
संध्या के सुनहरे सपने यथार्थ की धरती पर गिर कर चूर-चूर हो गए थे फिर भी उम्मीद की एक आस लिए वह सुख की असीम आकांक्षा लेकर जिए जा रही “।
संध्या को वैवाहिक जीवन से कोई सुख मिला ही नहीं ऐसी स्थिति में उसका चिड़चिड़ा हो जाना स्वाभाविक ही था। वो भी तीन बच्चों के साथ जीवन की मुसीबतें कुछ कम नहीं थीं। मुझे संध्या पर बहुत तरस आता।
मां-पिताजी भी बहुत दुखी रहते। बेटी को दुखी देखकर कौन मां-बाप खुश रह सकते हैं?
मैंने बड़े पिताजी को पत्र में लिखा कि जो होना था वो तो हो गया। संध्या को कोई छोटा बिजनेस करवा दें। इससे एक तो उसका मन लगा रहेगा और वह आर्थिक रूप से स्वावलंबी भी बन जाने से उसके हृदय का दर्द भी कुछ कम हो जाएगा। वह क्रोशिया वर्क और इम्ब्रायडरी वर्क में बहुत निपुण है क्यों नहीं उसे यह काम करने के लिए प्रोत्साहित करते? बाज़ार में इसकी मांग भी बहुत है। थोड़ी सी ट्रेनिंग लेकर वह यह काम शुरू कर सकती है। सरकार भी महिलाओं को बिजनेस शुरू करने के लिए बहुत कम सूद पर कर्ज़ देती है। आप उसे किसी न किसी काम में अवश्य लगाईए ,सब कुछ ठीक हो जाएगा। उसकी दोंनो लड़कियों और लड़के को पढ़ाना भी बहुत जरूरी है ताकि भविष्य में वे कोई भी मुश्किल का सामना स्वयं करने में सक्षम बन सकें। इतना लिखकर मेरे मन को कुछ शान्ति मिली और मैं उसके सुखद भविष्य की कामना के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगी । *****
लेखिका: डा. रमा द्विवेदी
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April 13, 2007 at 1:47 pm (मेरी कुछ कहानियां)
कहानीकार: डा. रमा द्विवेदी
“प्रेम” शब्द अपनेआप में कितना व्यापक अर्थ रखता है,कितनी गहराई तक इसकी जड़े समाहित होती हैं? कितनी ऊर्जा प्रदान करता है? संघर्षों से जूझने की कितनी शक्ति देता है? मनुष्य के चरित्र को कितना ऊंचा उठाता है यह “प्रेम”।यह तो वही बता सकता है जिसने कभी सच्चा प्रेम किया हो ।अक्सर रिश्तों में अधिकार की भावना इस प्रेम को बोझिल बना देती है, क्योंकि प्रेम शर्तों पर नहीं किया जा सकता ।’प्रेम’स्वत: अनायास ही उगता है,पल्लवित पुष्पित होता है,और अपना साम्राज्य स्थापित कर लेता है लेकिन यह सब कुछ होता है संवेदनाओं की नींव पर। अगर प्रेमासिक्त संवेदनाएं दो दिलों में न उगें तो संवेदनाओं के पुल का निर्माण कभी नहीं हो सकता} ‘प्रेम’ में सिर्फ़ देने की भावना ही होती है पाने की चिन्ता तो वे नहीं करते जो किसी से सच्चे दिल से प्रेम करते हैं।
प्रेम-पूर्ण द्रिष्टिमनुष्य को आकाश की ऊंचाईयों तक पहुंचा सकती है। प्रेमाश्रु से नख-सिख तक सराबोर कर सकती है। इसी प्रेम द्रिष्टि ने लैला-मजनूं,हीर-रांझा,
शीरी-फ़रियाद, सोहनी-महिवाल व रोमियो-जूलियट को महान बना दिया । यही द्रिष्टि पत्थर में भी प्राण फूंक देती है।हीरा को तराश कर सचमुच हीरा बना कर बेशकीमती बना देती है। इसी प्रेम द्रिष्टि ने मीरा को दीवानी मीरा और राधा को क्रिष्ण की आह्लादिनी शक्ति बनाकर अमरत्व प्रदान किया।न जाने कितने सूर्यों की ऊष्मा और न जाने कितने च्न्द्रमाओं की शीतलता रखती है यह द्रिष्टि। सागर की गहराई भी इसके सामने छोटी जान पड़ती है । यह द्रिष्टि पाने वाला व्यक्ति सात समन्दर पार बैठे व्यक्ति को भी अपने दिल के करीब महसूस करता है या यूं कहें कि प्रेम द्रिष्टि वह दूरबीन है जो अपने प्रिय को अपने अन्दर ही देखती है।
ऐसी ही प्रेम द्रिष्टि पाई थी मानसी और विराट ने। उनका विवाह माता-पिता की इच्छानुसार बिना लेन-देन के बड़ी ही सादगी से संपन्न हुआ था। लाड़ली मानसी की विदाई उसके माता-पिता ने बड़े ही भारी मन से की थी । लड़की के माता-पिता को कुछ तो दु:ख या चिन्ता तो होती ही है कि नए घर,नए लोग व नए माहौल में उनकी बेटी सहज महसूस करेगी या नहीं। फिर भी दिल पर पत्थर रखकर बेटी को दूसरे घर विदा करना ही पड़ता है।
विराट की पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी। वह पी.एच.डी. करने के लिए विदेश जाना चाहता था इसलिए उसके माता-पिता ने जल्दी ही उसकी शादी सुन्दर सुशील एवं पढ़ी लिखी मानसी से करवा दी। विराट बहुत ही कुशाग्र बुद्धी के मेधावी छात्र के साथ-साथ सह्रदय इंसान भी थे।उसने पहले दिन से ही मानसी का ख्याल रखा ताकि उसके घर में उसे कोई तकलीफ न हो फिर भी घरवालों का व्यवहार कुछ न कुछ गड़बड़ा ही जाता। विराट को यह सब अच्छा तो न लगता फिर भी वो उन्हें कुछ भी न कहता किन्तु मानसी के समक्ष माफ़ी मांग लेता। मानसी के लिए तो विराट का प्रेम ही उसका संबल था,इसी तरह दो माह बीत गए।
एक दिन एक पत्र प्राप्त हुआ, विराट ने उसे पढ़ा और खुशी से उछल पड़ा ।उसे ‘प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी’ में पी. एच. डी. के लिए एडमीशन मिल गया था और उसे जल्दी ही वहां जाना था।”विराट की इस खुशी में मानसी भी शामिल थी,किन्तु दिल के किसी कोने में एक चिन्ता थी कि वह विराट से अलग होकर इतने लंबे समय तक कैसे रहेगी? एक अन्जान भय भी था कि अगर विराट वापस नहीं आए तो?”पहले तो मानसी ने विराट को जाने की स्वीक्रिति नहीं दी किन्तु जब विराट ने आश्वस्त किया कि पढ़ाई पूरी होते ही वह शीघ्र वापस आ जायेगा या संभव हुआ तो उसे ही अपने पास बुला लेगा। मानसी के मन में कई दिन तक उथल-पुथल होती रही यह सोचकर कि जो विदेश जाता है,वापस ही नहीं आता लेकिन उसने अपने मन को यह कहकर समझा लिया कि जो होगा देखा जायेगा। उसे विराट की बातों पर विश्वास था इसलिए अग्यात भय से कंपित होते हुए भी उसने विराट को जाने की स्वीक्रिति दे दी। वह उसके उज्जवल भविष्य में बाधक नहीं बनना चाहती थी किन्तु उसने विराट से यह आश्वासन अवश्य ले लिया कि वो निरन्तर पत्र लिखेगा या फोन करेगा। विराट ने उसकी यह मांग सहर्ष मान ली क्यों नहीं मानता? वह भी तो मानसी से दूर नहीं रहना चाहता था।
विराट के जाने की तैयारियां शुरू हुईं। समय के जैसे पंख लग गए हों। शीघ्र ही वो दिन भी आ गया जब विराट सबको छोड़ कर दूर जा रहा था। परिवार के सभी लोगों के साथ मानसी भी उसे विदाई देने एयरपोर्ट गई। सामान की चेकिंग के बाद विराट एक बार फिर अंतिम विदा लेने के लिए आया। रेलिंग के उस पार से उसने अपने लोगों से थोडी बातें की सबसे हाथ मिलाकर अंतिम विदाई ली किन्तु उसने मानसी को बड़ी ही दयनीय प्रेमपूर्ण द्रिष्टि से देखा,शब्द मौन हो गए थे। क्या था उस प्रेमद्रिष्टि में-प्रेम-आश्वासन-या बिछुडने का दु:ख।
कभी-कभी यह द्रिष्टि भी कितनी गहरी-प्रखर-मुखर हो जाती है कि बिना कुछ कहे ही क्या-क्या नहीं कह देती?जो भी था विराट की वह द्रिष्टि मानसी के ह्रिदय में सीधे उतर गई। एक बार तो उसे लगा कि उसका कलेजा ही बाहर आ जायेगा और वो फूट-फूट्कर रो पडेगी किन्तु उसने मुश्किल से अपने को संयत कर लिया। बस वो एक द्रिष्टि को दिल में बसाए घर वापस आ गई। विराट का प्रेम ही अब उसके जीवन को चलाने का आधार बन गया।
कुछ हफ्तों के बाद विराट का पत्र आया कि अब वह व्यवस्थित हो गया है। अन्य तमाम बातों के साथ लिखा था कि वह अपना विशेष ख्याल रखे। अगर मन न लगे तो अपने माता-पिता के घर चली जाए, वो अपने माता-पिता से कह देगा। वे उसे भेजने से मना नहीं करेंगे।इस तरह महीने साल बीत गए। मानसी कभी अपने माता-पिता के घर और कभी विराट के घर आती जाती रही किन्तु विराट की कमी हमेशा खलती रही लेकिन विराट के स्नेहपूर्ण पत्रों के सहारे सदैव ही उसे अपने पास महसूस करती। अक्सर अपने मन को यह कह कर समझा लेती कि पढ़ाई पूरी होते ही शीघ्र ही वापस आ जायेगा।
अकस्मात मानसी कुछ ऐसी बिमार पड़ी कि बहुत इलाज करवाने के बाद भी उसकी सेहत में सुधार नहीं हो रहा था वह दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी। डाक्टरों को समझ में नहीं आ रहा था कि उसका ‘ब्लडप्रेशर लो’ क्यों रहता है?घर के लोग भी चिन्तित रहते कि हम विराट को सूचित कर देते हैं किन्तु मानसी उन्हें बताने न देती यह कहकर कि पढ़ाई छोड़कर आ जायेंगे। कुछ ही महीनों की तो बात है। मानसी का स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा था। स्थिति गंभीरता को भांपकर विराट की मां ने विराट को यह सूचना दी कि मानसी की तबियत काफी नाजुक है। विराट को जैसे ही यह खबर मिली वो उस रात सो नहीं सका। तमाम कुशंकाओं ने उसके मन को बेचैन कर दिया। अब उसकी एक ही चिन्ता थी कि वह शीघ्र ही मानसी के पास पहुंच जाए। सुबह होते ही बड़ी मुश्किल से टिकट का बंदोबस्त किया और शीघ्र ही हवाई जहाज में बैठ गया किन्तु सफ़र था कि काटे नहीं कट रहा था। कुछ घंटे वर्षों के समान प्रतीत हो रहे थे । तरह -तरह के बुरे ख्याल उसके मन -मस्तिष्क को उद्वेलित करते रहे जैसे -तैसे प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुईं और विराट मानसी के पास पहुंच गया।
मानसी बहुत कमजोर हो गई थी इसलिए बिस्तर से उठ भी नहीं सकती थी। विराट ने उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर चूम लिया और बोला-”तुमने यह क्या हालत बना ली है अपनी? ऐसा कौन सा ग़म है जो तुम्हें अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है? अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा । तुम जल्दी से ठीक हो जाओ”। मानसी बहुत खुश थी कि विराट उसके पास था किन्तु दु:ख इस बात का था कि वो अपनी पढ़ाई पूरी किए बिना ही उसके कारण वापस आ गया। मानसी ने विराट को बहुत समझाया कि वह उसकी चिन्ता न करे। वह ठीक है,शीघ्र वापस चला जाए और अपनी पढ़ाई पूरी करे। विराट ने कहा-”नहीं मैं अब तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा”। दोनों में बहुत बहस हुई इस बात पर,” मानसी ने कहा कि यह संभव नहीं है। अभी तुम्हारी नौकरी भी नहीं है, कैसे तुम मेरा खर्च उठाओगे”?लेकिन विराट ने उसकी एक न सुनी और विराट ने ही अपने माता-पिता से कहा कि वो मानसी को साथ ले जाना चाहता है। पहले तो उन्हें इस बात पर असमंजस हुआ किन्तु जब विराट ने हठ की तो माता-पिता मान गए।आखिर बेटे की खुशी में ही उनकी खुशी थी। काफी भागदौड़ व कागजी कार्यवाही के पश्चात मानसी को साथ ले जाने का “वीज़ा” मिल गया। विराट मानसी को लेकर वापस चला गया।
मानसी को माता-पिता व सास-ससुर को छोड़ने क दु:ख तो अवश्य था किन्तु विराट के साथ रहने की खुशी ने इस ग़म को भुलाने में मदद की । वहां पहुंच कर विराट ने मानसी का इलाज करवाया । कुछ तो दवाईयों का असर था और अधिक विराट के प्यार एवं निकटता से मानसी के स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक सुधार होने लगा और शीघ्र ही मानसी ठीक हो गई लेकिन विराट को इस बीच काफी श्रम करना पड़ा अधिक धनार्जन करने के लिए । विराट अधिक से अधिक समय काम करता जिससे उसकी पढ़ाई पूरी होने में विलंब हो गया । जब मानसी को यह पाता चला कि विराट आर्थिक संकट से जूझ रहा है तब उसने एक परिचित की सहायता से नौकरी ढूंढ़ ली और एक स्टोर में नौकरी करने लगी । नौकरी छोटी ही थी किन्तु विराट के लिए यह बहुत मददगार साबित हुई उनके जीवन की जरूरतें पूरी होने लगी।”अहसास बताने की नहीं अनुभूति की वस्तु होती है। अनुभूति स्वयं सब कह देती है। दिखावा-छ्लावा में दो रिश्तों के बीच सेतु बन नहीं सकते और झूठ कभी टिकाऊ नहीं होता। कुछ लोग स्वाभाव के गंभीर होते हैं वे अपना स्नेह ठीक से दिखा नहीं पाते। बेमौसम के बदरा से बरसते नहीं । गंभीर और परिपक्व प्यार ही टिकाऊ होता है और जीवनरूपी गाडी को संतुलित रखने के लिए एवं चलाने के लिए ऐसे ही आत्मीय-विश्वसनीय क्षणों की ही आवश्यकता होती है,जो तपती धूप में एक दूसरे के लिए शीतल छांव बन जाए । ह्रिदय से ह्रिदय का जोड़ इससे ही मजबूत बनता है।” मानसी ने विराट को प्रोत्साहित किया कि वो अपनी पढ़ाई शीघ्र ही पूरी करे तब तक वो काम करेगी । विराट ने अपना अधिक से अधिक समय पढ़ाई में लगाया और कुछ ही महीनों में उसको पी.एच.डी. की डिगरी भी मिल गई । दोनों उस दिन बहुत खुश हुए । प्रयास करने पर एक अच्छी साफ्टवेयर कम्पनी में नौकरी भी मिल गई तब विराट ने मानसी का काम करना बन्द करवा दिया । जीवन खुशी-खुशी बीतने लगा । ऐसे ही कई वर्ष बीत गए। इस बीच वे मैत्रेयी और अंश दो बच्चों के माता-पिता भी बन गए। मानसी बच्चों के पालन-पोषण,पढ़ाई-लिखाई में उलझी रहती और विराट आफिस के काम में व्यस्त रहता। सब कुछ ठीक ही चल रहा था।
मुसीबत बता कर नहीं आती । अचानक नई सरकार बनने से अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई और हजारों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यह गाज विराट पर भी गिरी । ज्यादातर लोग अपने-अपने वतन को लौट गए किन्तु विराट और मानसी वहीं बने रहे।
कुछ महीनों तक तो बचत से काम चला लेकिन शीघ्र ही उन्हें लगने लगा कि अगर काम नहीं मिला तो आगे जीवन निर्वाह करना मुश्किल हो जायेगा । तब दोनों ने नौकरी के लिए हाथ -पांव मारना शुरू किया । उन्हें जो भी छोटी बड़ी नौकरी मिली दोनों करने लगे जीवन सुविधापूर्ण तो नहीं लेकिन किसी तरह चलने लगा । कुछ ही वर्षों में जब आर्थिक व्यवस्था में सुधार हुआ विराट को फिर अच्छी नौकरी मिली किन्तु कड़ी मेहनत करके ही दोनों आगे बढ़ सके एवं बच्चों को पढ़ा-लिखा कर स्वावलंबी बना सके।
इस तरह जीवन के तीन दशक कब बीत गये उन्हें पता ही नहीं चला?”आज जब दोनों सोचते हैं तब लगता है कि अगर एक दूसरे का साथ न होता तो इस परदेश में वे किसके सहारे जीवन गुजारते? उनके जीवन में कई ऐसे झंझावात आए जो उनके जीवन को बुरी तरह झकझोर देते थे लेकिन ये संवेदनाओं के ऐसे पुल थे जो हिल तो जाते थे लेकिन कभी ढ़ह नहीं सके। उनके बीच जो प्रेम-आत्मीयता-विश्वास की ऊष्मा व ऊर्जा थी वो आज भी वैसी ही तरो-ताजा है उसमें कहीं भी लेशमात्र भी बदलाव नहीं आया ।”
“काश !आज की नई पीढ़ी के पति-पत्नी में भी ऐसी संवेदनशील सोच-समझ व आत्मीयता होती जो जीवन की कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने की शक्ति दे सकती और छोटी-छोटी बातों को लेकर स्थिति तलाक तक तो न पहुंचती।”
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डा. रमा द्विवेदी
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October 5, 2006 at 6:09 pm (मेरी कुछ कहानियां)
पुनर्विवाह दंश (कहानी)
लेखिका: डा. रमा द्विवेदी
छोटे से गांव में जन्मी पूर्नियां का विवाह नौ वर्ष की अवस्था मेंसतरह वर्षीय भगवानदस के साथ संपन्न हुआ था।पूर्नियां तो बस गहने-कपडे पाकर ही खुश थी।उस समय उसे विवाह का अर्थ भी मालूम न था । अपने नन्हें दोस्तों को अपने गहनें-कपडे दिखा कर वह बहुत खुश हो रही थी,जैसे उसे कोई अमूल्य निधि मिल गई हो। अल्पायु पूर्नियां को ससुराल नहीं भेजा गया।बारात वापस चली गई।
समय के जैसे पंख लग गए देखते ही देखतेपूर्नियां तेरहवें वर्ष में प्रवेश कर गई।शुभ मुहूर्त में उसके ससुराल वाले उसे विदा करवा कर ले गए।अनेक रीतिरिवाजों के साथ पूर्नियां का स्वागत हुआ और वह क्षण भी आ गया जब डरी सहमी सी उसने पति के चरणों में समर्पण कर दिया। ज़िन्दगी की दिनचर्या सहज रूप से चल रही थी ।दो वर्ष होते- होते पूर्नियां एक पुत्र की मां भी बन गई ।मां बनकर वह बहुत खुश थी ।
अभी एक वर्ष भी नहीं बीता था कि भगवानदास को ऐसा ज्वर चढा. कि फिर उतरा ही नहें ।घरेलू उपचार करते रहे क्योंकि छोटे से गांव में अस्पताल या डाक्टर नहीं था। उचित चिकित्सा के अभाव मेंउनकी म्रत्यू हो गई। पूर्निया पर मुसीबतों का पहाड टूट पडा। वह कई दिनों तक रोती-विलखती रही किन्तु जो सच था वह बदल नहीं सकता था। पूर्निया एक ही जगह पडी रहती ,उसका शरीर मानों स्पन्दनरहित हो गया हो। उसकी यह दशा देखकर सब यही कहते-”बेचारी की उम्र ही क्या है?पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा?” लोगों के शब्द उसके ह्रदय को छलनी कर देते। दूसरी चिन्ता उसे खाए जा रही थी कि जब घरवालों को उसके दो माह के गर्भ के बारे में पता चलेगा तब वे उसके साथ कैसा सलूक करेंगे?
जैसे-तैसे दिन काटने लगी।अपने को उसने यह समझा कर संभाल लिया कि बेटे के लिए तो जीना ही पडेगा। सास बेटे की म्रित्यु का दोष उसपर डाल रात-दिन कोसती प्रताडित करती कुलच्छिनी डायन मेरे बेटे को खा गई।वह खून के घूंट पीकर रह जाती,कुछ न कहती। अधिक श्रम का काम उससे करवाया जाता। उसस्के नन्हे से बेटे को भी बिना दूध की बासी रोटी खाने को दी जाती। जी-तोड मेहनत के बावजूद भी उसे बचा-खुचा खाना ही दिया जाता। वह उसे ही अपने बच्चे को खिला कर खुद खाती और संतुष्ट हो जाती। उसके दुखों का अन्त यहीं हो जाता तो अच्छा होता किन्तु भाग्य को किसने देखा है?
उसकी सास बडी ही दुष्ट और कर्कशा स्त्री थी। विधवा थी,किसी का अंकुश उस पर नहीं था।दिन्प्रतिदिन वह उसपर जुल्म ढाने लगी। ऐसी ही कठिन परिस्थितियों में एक दिन उसने सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।सूतक में भी पुर्नियां की सही देखभाल नहीं हुई। सास को उसपर दया नहीं आईऔर उसका दुर्व्यवहार जारी रहा।
पुर्नियां की सहन शक्ति चुक गई थी।प्रतिदिन की कलह से तंग आकर उसने अपने पिता को बुला भेजा और अलग रहने की इच्छा प्रगट की।पिता ने पंचों को जमा करके पुर्नियां को जायदाद में हिस्सा देने की बात रखी किन्तु उसकी सास ने हिस्सा देने से साफ मना कर दिया। उसकी गांव में बडी धाक थी या यह कहिए कि पंच भी उसके खिलाफ नहीं जा सकते थे। बहुत समझाने पर एक कमरा और प्रतिदिन के हिसाब से एक सेर अनाज और एक कटोरी दाल्देने के लिए वह रजी हुई। इतने में दो बच्चओं क,पिता और खुद का खाना भी नहीं चलता था।फिर अन्य खर्च ? वह घर में रहकर लोगों का पीसना कूटना करके देने लगी। जैसे-तैसे दिन गुजरने लगे। बूढे पिता से बेटी का दुख देखा न गया ऊपर से सास आते जाते खरीखोटी सुना ही जाती।
एक दिन पिता ने कहा-”तुम मेरे साथ चलो,मैं वहीं तुम्हारा प्रबन्ध कर दूंगा”।
पूर्नियां के माता-पिता और भाईउसकी नि:संतान मैसी के घर रहते थे।मौसी का अलग रुत्बा था। उनकी बात और जबान अत्यधिक कटु थी। यहां आकर पूर्नियां को कुछ स्वतन्त्रता तो अवश्य मिल गई किन्तु मेहनत करके ही जीना था अत:वह अपने पडोसी शिवशंकर से एक छोटी सी कोठरी मांगकर एक छोटी सी दुकान खोल ली।कोसो चल कर सामान लाती और बेंचती।इस तरह कडी मेहनत करके अपने ब्च्चों की परवरिश करने लगी।
शिवशंकर स्वतन्त्रता सेनानी थे।कभी जेल जाते तो कभी छूट जाते इसलिए उम्र हो जाने पर भी कुंवारे थे।बचपन से ही वे पूर्नियां को चाहते थे। एक दिन जब वे जेल से छूट कर आए तो वे पुर्नियां के कष्टों को देख कर द्रवित हो गए। मन ही मन उन्होंने उसे अपनाने का संकल्प कर लिया।उसे अपने विश्वास में लेने का प्रयत्न करने लगे और पूर्नियां भीन जाने किस आकर्षण के वशीभूथोकर उनकी ओर खिंची चली गई और एक दिन मर्यादा की सीमाएं टूट गईं।
पूर्नियां चिन्तित रहने लगी कि अगर किसी को पता चलाकि वह गर्भवती हैतो उसके भाई-बाप उसे जिन्दा ही ज़मीन में गाड. देंगे। इसी चिन्ता में घुली जा रही थी कि उसके बच्चों राम और श्याम का क्या होगा? तभी एक दिन किसी ने उसकी मौसी को किसी ने बता दिया कि वह गर्भवती है। अब क्या था? क्षण भर में घर में भूचाल आ गया। उसके बडे भाई ने उसे बहुत मारा-पीटा और घर से निकाल दिया। बच्चे भी चीन लिए।वह अभी सोच ही रही थी कि वह क्या करे? कहीं जाकर मर जाए? या कहीं चली जाए?लेकिन कहां जाए?अपना कोईनहीं था?मरने की हिम्मत वह जुटा नहीम पा रही थी। तभी शिवशंकर वहां आएऔर उसे बाइज्जतपने घर ले गए और भगवान को साक्षी मान कर विवाह कर लिया।
पूर्नियां को इस विवाह से एक सुद्रुढ. सहारा तो मिल गया किन्तु मानसिक धरातल पर वह विक्षिप्त रहने लगी। समाज उसे हेय द्रिष्टी से देखता था। वह एक वर्ष तक नज़रबंद होकर रह गई। बच्चों की याद में वह छटपटाती और अपने आप को कोसती। इस गम ने उसे अनदर से तोण्ड दिया। अपना सारा आक्रोश वह शिवशंकर पर ही उतारती। वे सह लेते कि कभी तो घाव भर जाएंगे और यह नार्मल हो जाएगी।
शिवशंकर अक्सर राजनीति के कार्यों में उलझे रहते। समाज में उनका सम्मान था इसलिए समाज की उपेक्षा का दंश उन्हें नहीम झेलना पडा। सच तो यह था पूर्नियां को अपना कर उनमें कोइ हीन भावना भी नहीं आई थी लेकिन पूर्नियां स्त्री थी और मां भी। उसकी आन्तरिक कुढ.न और घुटन बढती ही गई।
एक दिन उसने एक पुत्र को जन्म दिया।शिवशंकर खुशी से फूले न समाए। पुत्र का नाम रखा उमाशंकर।पूर्नियां को इस पुत्र के जन्म पर खुशी कम उन बिछुडे पुत्रों का गम अधिक था।सबसे बडी विडम्बना यह थीकि वे सामने के घर में ही रहते थे। वह उन्हें देखने के लिए घंटों दरवाजे की ओट में खडी रहतीकिन्तु न जाने वे कहां छुप जाते कि दिखई ही न देते। यह दु:ख उसे घुन की तरह खाए जा रहा था। वह हमेशा यही सोचती उसने पुनर्विवाह क्यों किया?कैसे वह कलेजों के टुकडों को अलग कर सकी? उसे यह सुख भोगने का कोई हक नहीं ? उसकी इसी घुटन ने उसे मानसिक रूप से बिमार बना दिया।
धीरे-धीरे समाज से उसका संपर्क बढा। उसकी बचपन की एक सहेली थी’कमली’।उसके भी दो बच्चे थेऔर जवानी में ही वह विधवा हो गई थी किन्त माता-पिता की इक्लौती संतान होने के कारण सुखपूर्वक जीवन बिता रही थी। उसने दूसरी शादी तो नहीं की किन्तु अपनी आवश्यकताओंकी पूर्ति अन्य तरीकों से की और बहुत बदनाम भी हो गई। उसए देख कर पूर्नियां को कुछ संतोष होता कि उसने जो किया है,खुलेआम किया हैऔर एक ही व्यक्ति से किया हैकिन्तु उसका विवेक ज्यादा देर तक न रहता और भावना प्रबल हो जाती।
राम और श्याम किशोरावस्था में पहुंच गए। राम त्प शान्त प्रकित का था किन्तु श्याम मां के प्रति विद्रोही बन गया। वह मां को खुलेआम गालियां देता,घर में पत्थर फेंकता और तरह तरह से नुकसान पहुंचाने की योजनाएं बनाता। बेटे का विद्रोही रूप देखकर वह अन्दर से टूटती गई और सदैव स्वयं को ही दोषी पाती।
श्याम की शादी हो गई। विवाह के तीसरे वर्ष वह बेटे का पिता भी बन गया। अभी विवाह चार वर्ष पूरे भी नहीं हुए थे कि अचानक हार्ट-अटैक से श्याम की म्रित्यु हो गई। मां की ममता हाहाकार कर उठी। गिरती-पडती बेटे के पास पहुंची किन्तु बहू बहुत दुष्ट थी उसने उसे दरवाजे पर ही दुत्कार दिया। वह अपमानित होकर भी उनकी देहरी पर बैठकर रोती रही। सुबह बेटे की अर्थी उठते वह फूट-फूट कर रो पडी। बेटे के अंतिम दर्शन के लिए अर्थी के पास गई,लेकिन निर्दयी बहू ने उसे दूर ढकेल दिया। बेटे की म्रित्यु का गहरा आघात उसे पहुंचा। सामने जवान बहू और एक वर्ष का पोता? वह सोचती बहू का पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा? वह भी तो उसके साथ नहीं रहती।वह क्या करे? कैसे उसकी मदद करे?उसने पुनर्विवाह क्यों किया? उसे जीने का हक नहीं है।इतना बडा सदमा वह कैसे सह सकी? अनेकानेक ऐसे प्रश्न थे जो उसके मस्तिष्क को झंझोरते रहते। वह इन प्रश्नों से जूझती जिन्दा लाश की तरह रहने लगी।
इधर उमाशंकर की भी शादी हो गई। पूर्नियां के मन में एक कुंठा घर कर गई कि उसने पुनर्विवाह करके ठीक नहीं किया। इसी दर से वह अपनी बहू का अतिरिक्त ख्याल रखती किन्तु बहू थी दुष्ट। वह अपने पति से उनकी शिकायतें करके मां बेटे को लडवाती। इससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पडा और उसे पित्ताशय का कैंसर हो गया। शीघ्र ही इलाज के अभाव में शरीर जर्जर हो गया और एक दिन वह तमाम कष्टों एवं कुंठाओं से घिरी चिर निद्रा में लीन हो गई। उसके शान्त और सौम्य चेहरे को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह वह अपने जीवन के तमाम कष्टों से मुक्ति पा गई है।*********
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