April 22, 2008 at 11:26 am (संवेदना की अनुभूतिय)
Tags: जहर की सुई
माना कि सौन्दर्य के प्रति,
स्त्री का विशेष लगाब,
सदियों से रहा है,
आधुनिक युग में यह सौन्दर्य-प्रेम,
बेतहासा,बेलगाम बढ़ा है
सौब्दर्य बढ़ाने की तमाम तकनीकें,
पीछे छूट गई हैं।
अब कमसिन दिखने की,
एक नई जहर की सुई ईजाद हुई है,
जिसके के लगवाने से चेहरे की झुर्रियां
कुछ हफ़्ते- महीने के लिए
गायब हो जाती हैं,
और सौन्दर्य में चार चाँद लग जाते हैं,
और फ़िर त्वचा,
पहले से भी ज्यादा,
कान्तिहीन हो जाती है,
फ़िर जहर की सुई लेनी पड़ती है,
विषकन्याएँ ऐसे ही तैयार की जाती थीं,
फ़र्क बस इतना है,
कि रूप- सौन्दर्य बढ़ाने के लिए
चेहरे पर जहर की सुई दी जाती है,
और विष-कन्या को जहर खिलाया जाता था,
यहाँ रूप-सौन्दर्य देखकर,
लोगों के होश खो जाते हैं,
और वहाँ विष-कन्या के काटने मात्र से
कभी होश में आते नहीं।
डा. रमा द्विवेदी
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March 29, 2008 at 5:54 am (संवेदना की अनुभूतिय)
हे सृजनकर्ता,
तूने यह कैसी दुनिया बनाई,
आदमी, आदमी को खा रहा है,
जन्मदाता भी भक्षक बन रहा है.
मानवीय प्रकृति के समीकरण,
बड़ी तेजी से बदल रहे है,
संवेदनशीलता नए सांचे में ढ़ल रही है,
कलियों को खिलने से पहले ही,
मसला कुचला जा रहा है,
दहशत ही दहशत,
आंख के आंसू सूख चुके हैं,
वाणी मूक है, कान बहरे हो गए हैं,
किससे फ़रियाद करें?
जहां जाएं खूंख्वार भेड़िए ,
मांस खाने के लिए घात लगाए बैठे हैं,
शायद इसलिए ही वह,
कई नर्कों से बचने के लिए,
एक ही नर्क भोगने के लिए विवश है।
डा. रमा द्विवेदी
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March 22, 2008 at 11:12 am (संवेदना की अनुभूतिय)
Translated from Hindi by Elizabeth Kurian ‘Mona’
Feelings
It is not imperative
That every sentiment
Has to travel the path
Of definitions;
Words have their own limits
Sometimes they are of no help;
On meeting and conversing
Often we feel that
What was to be expressed
Remained unsaid.
Love is such a feeling
Which has no compulsion of relationships;
Nameless love goes ever forward.
But relationships seek their price
Every moment,
On not getting payment,
They hiss, crack, break and scatter.
Even then, the bondage of relationships
People name as love.
What a mockery of life is this?
Why do many not comprehend
The value of true love?
Despite this, some love
Throughout their lives
Just because
Love is their integrity
Their humanity,
Their worship.
Dr. Rama Dwivedi
Hindi Version
अनुभूति
हर अनुभूति परिभाषा के पथ पर बढे-
यह आवश्यक नहीं,
शब्दों की भी होती है एक सीमा,
कभी-कभी साथ वे देते नहीं,
इसलिए बार -बार मिलने व कहने पर,
यही लगता है जो कहना था, कहां कहा?
‘प्रेम’ ऐसी ही इक ‘अनुभूति’ है,
वह मोहताज नहीं रिश्तों की।
अनाम प्रेम आगे ही आगे बढता है,
किन्तु रिश्ते हर पल मांगते हैं-
अपना मूल्य?
मूल्य न मिलने पर,
सिसकते,चटकते,टूटते,बिखरते हैं,
फिर भी रिश्तों की जकडन को,
लोग प्रेम कहते हैं।
कैसी है विडम्बना जीवन की?
सच्चे प्रेम का मूल्य,
नहीं समझ पाता कोई?
फिर भी वह करता है प्रेम जीवन भर,
सिर्फ इसलिए कि-
प्रेम उसका ईमान है,इन्सानियत है,
पूजा है॥
डा. रमा द्विवेदी
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November 19, 2007 at 5:56 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
तुझमें मुझमें बस इक अन्तर,
तुम नर हो अरु मैं नारी हूं।
देती हूं जन्म मैं जीवन को,
तुम जीवन को ठुकराते हो॥
संबंधों का मैं संबल बनती,
अरु प्रेम की ज्योति जगाती हूं।
करती प्रयास मंगल का मैं,
तुम नफ़रत को फैलाते हो॥
मैं फूलों की कोमलता हूं,
तुम मधुकर कठोर बन जाते हो।
लेकर के रस सब फूलों का,
अन्यत्र खोज में जाते हो॥
करती हूं प्रतीक्षा सदियों तक,
तुम पल भर में घबराते हो।
रहती हूं मौन त्याग करके,
तुम पल-पल हमें जताते हो॥
खोने का डर तो तुमको है,
इसलिए झपट सब लेते हो।
कहने को कुछ नहीं पास मगर,
फिर भी इतिहास रचाते हैं॥
सरिता सलिला सी बहती हम,
सिंचित करती हैं जीवन को।
तुम रहते स्थिर एक जगह,
कूलों सा कठोर बन जाते हो॥
वन-उपवन की सुन्दरता हम,
तुम पतझड़ बन कर आते हो।
करते हो तांड़व नृत्य तुम्हीं,
हरियाली हर ले जाते हो॥
संघर्षों में जी लेते हम,
तुम सुख को गले लगाते हो।
करते हो सुख परिवर्तन भी,
बादल बन उड़-उड़ जाते हो॥
डा. रमा द्विवेदी
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October 19, 2007 at 5:20 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
किसी को क्या बताएं कब हमारा दम निकलता है,
अगर उनको भुलाएं हम हमारा दम निकलता है॥
यह उनके रूप का जादू पिये बिन ही बहकते हम,
नशा गर यह न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥
ये आंखें बोलतीं उनकी,जुबां रस घोलती उनकी,
अगर ये मौन हो जाएं हमारा दम निकलता है॥
घनेरी काली जुल्फ़ों संग नहीं है धूप की चिन्ता,
घटा बन गर बरस जाएं हमारा दम निकलता है॥
ये मीठे से गिले-शिकवे बहुत नीके लगें मन को,
मगर जब रूठ जाएं ये हमारा दम निकलता है॥
अदा प्यारी लगे उनकी इक सदा पर दौड़े आते है,
सहारा गर न पाएं हम हमारा दम निकलता है॥
अंधेरे गहरे सागर में पुतलियां मीन सी तिरतीं,
कहीं जब चांद न पाएं हमारा दम निकलता है ॥
डा. रमा द्विवेदी
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October 5, 2007 at 4:50 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
Translated from Hindi by Elizabeth Kurian ?Mona?
Be Not A Banyan Tree
Oh mortal,
Do not become a banyan tree
Permit new plants also to flourish;
You may be great,
Firm and strong,
Therefore unshakeable,
Not letting anyone near,
Thus standing for ages.
If you take up the whole life energy,
What would be the fate of the plants nearby?
They would die an untimely death
Solely on your account
Since no plant can survive
Under your shade.
Your greatness does not lie in
Not letting anything grow;
Even if you do not provide shade,
Some other tree will do so,
Will not deprive them of life.
Like you do.
Ponder deeply
That because other plants exist,
Your existence is great;
If smallness is not present,
Where is the grandeur in bigness?
Without night, what is day?
What is greatness, which benefits none?
It becomes a load on the earth
And earth wishes to be liberated
From such a burden.
Dr. Rama Dwivedi
Hindi version
वटवृक्ष मत बनो
हे मानव !
तुम वटवृक्ष मत बनो,
नई पौध को भी उगने दो,
माना कि तुम महान हो,
सुदृढ़ शक्तिमान हो,
इसलिए जमकर डटे हो,
नहीं फटकने देते किसी को,
इसलिए सदियों तक खड़े हो।
पूरी जीवन-ऊर्जा अगर तुम ही ले लोगे,
तो आस-पास के पौधों का क्या होगा?
मर जायेंगे वे असमय में ही,
वह भी तुम्हारे कारण ,
क्योंकि तुम्हारी छाया में,
कोई पौधा पनप नहीं सकता।
तुम्हारी महानता इसमें नहीं
कि तुम किसी को पनपने न दो,
तुम अगर छाया न भी दो,
तो कोई अन्य पेड़ छाया देगा,
किन्तु तुम्हारी तरह,
जीवन तो नहीं छीनेगा।
अच्छी तरह सोच लो,
अन्य पेड़ हैं इसलिए,
तुम्हारा अस्तित्व महान है।
लघुता न हो तो गुरुता का महत्व क्या?
रात न हो तो दिन का अस्तित्व क्या?
सबलता अगर किसी के काम न आए?
तो वह धरती पर बोझ बन जाती है,
और धरती भी उसके बोझ से,
मुक्त होना चाहती है।
डा. रमा द्विवेदी
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May 25, 2007 at 5:36 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
कैसी घटा घनघोर ये,
बरसी सी है इतनी जोर से।
पलभर में जल ही जल हुआ,
मुंबई को रख दी बोर के॥
कोई तो छत पे चढ़ गया,
कोई तो जल में धंस गया।
कोई पुकारे त्राहि-त्राहि ,
यम सामने कठोर है॥
कोई भूख से बेचैन है,
कोई प्यास से बेहाल है।
बच्चे सिसकियां भर रहे,
और मां भी तो मजबूर है॥
जोड़ा था धन जतन से जो,
सब बह गया बिन यतन के वो।
दिल चीखता ही रह गया,
चलता न कोई जोर है॥
सूरज कहीं दुबक गया,
और वक़्त भी सहम गया।
रात भी ठिठुर गई,
प्रकृति भी कितनी क्रूर है॥
कहने को तो पानी ही था,
पर रच गया कहानी था।
सागर उफनता घर घुसा,
मेंघों का यह प्रकोप है॥
डा. रमा द्विवेदी
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April 3, 2007 at 4:49 am (संवेदना की अनुभूतिय)
1- मेघ के जलधार बिन,
धरती भी ऊसर बन गई।
प्रेम के रसधार बिन,
मानव को छ्लना छल गई।
2- मानव हृदय छलनी हुआ,
अरू रक्त में भी है कमी।
कैसे जियेगा ज़िन्दगी?
बौना हुआ जब आदमी।
डा. रमा द्विवेदी
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April 2, 2007 at 10:01 am (संवेदना की अनुभूतिय)
लड़की की विदाई के समय सबने कहा,
अब सब कुछ भूल कर,
अपना पति और घर-संसार देखना ,
हां मैं भी तो इसी सीख पर
चाहती हूं चलना,
किन्तु क्या करूं?
पहली छुअन,पहलेपहल दिल का लगना,
कभी भूलता नहीं,
तो फिर कैसे?
इस आरोपित पुरुष के प्रति प्रेम करूं?
कैसे ? कैसे? वो करूं?
जिसके स्पर्श मात्र से,
बदन में सहस्त्र शूलों के चुभने का,
असहनीय दर्द कराह उठता है,
आत्मा को लहुलुहान करता,
देह लाश बन जाती है,
फिर भी वह आरोपित पुरुष,
भोगता है उस जिन्दा लाश को,
क्योंकि वह उसकी ब्याहता है,
अपने अधिकार को,
कैसे छोड़ दे?
लेकिन उसने तो अपने अधिकार का,
दावा कभी नहीं किया,
चाहे उसने उसे ,
दूसरी स्त्री की बाहों में
झूलते ही क्यों न देखा हो?
यह अधिकारबोध
सामाजिक मर्यादाओं का बंधन है
या आत्मा की सीमाएं,
जिसे एक तो लांघ सकता है,
किन्तु दूसरा?
अपनी आत्मा की बलि चढ़ा कर भी,
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए भी,
वह नहीं लांघ सकती,क्यों?
कैसी विड़म्बना है जीवन की,
कितनी विचित्र हैं मान्यताएं?
हरदम स्त्री को ही कोसा जाता है,
अग्नि परीक्षा उसे ही देनी पड़ती है?
आखिर क्यों और कब तक??
डा. रमा द्विवेदी
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March 24, 2007 at 12:34 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
ऊंचाई मनुष्य को अपने परिवेश से,
करती है अलग,
ऊंचाई चाहे पद की हो,
पैसे की हो या ज़ान की,
मनुष्य सहज नहीं हो पाता,
अपने स्तर की चाह में वो,
कहीं सुकून नहीं पाता,
स्तर की समानता है आवश्यक,
समानता जुड़ने का है एक माध्यम,
असमानता में मानव टूट सकता है,
किन्तु वह सहज नहीं हो पाता।
विचारों की असमानता,
संबंधों के टूटने का,
है एक विशेष कारण,
विचारों की असमानता ,
मनुष्य को अनजाने ही,
कठोर बना देती है,
आत्म विस्तार के अभाव में,
अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को ,
दांव पर लगा देती है।
झगड़ा रिश्तों का नहीं,
विचारों का होता है,
विचारों के झगड़े में ही,
मानव रिश्तों को खोता है।
रिश्तों को निभाने का वह ,
असफल प्रयास करता है,
किन्तु अपनी सोच के परिवर्तन का,
कोई उपचार नहीं करता,
हर समस्या का समाधान ,
हर एक के दिल में होता है,
विश्वास,आत्मीयता,सही सोच,
रिश्तों को बनाये रखने का,
अचूक हल होता है।
डा. रमा द्विवेदी
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