March 21, 2008 at 4:07 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
होली का दिन है आज,होली कैसे मनावै?
भाई-भाई में जंग छिड़ी है,
खून की बढ़ी ऐसी प्यास….
होली कैसे मनावै।
कच्ची कलियां सहमी-सहमी लागें,
अहसासों की पड़ी है लाश…..
होली कैसे मनावै।
गांव सुलग रहे,नगर सुलग रहे,
सुलग रहा है संसार….
होली कैसे मनावै।
झांझ मंजीरा थाप मृदंग पर,
सबहीं पड़े हैं उदास…
होली कैसे मनावै।
होली के सब रंग बदल गए,
बदल गए हैं अंदाज़….
होली कैसे मनावै।
रंग के बदले कीच उछाले,
शब्दों का छिड़ा संग्राम….
होली कैसे मनावै।
होली फीकी है प्रेम रंग बिन,
राधा कान्हा भी उदास….
होली कैसे मनावै।
डा. रमा द्विवेदी
2 Comments
February 21, 2008 at 9:25 am (सृजन के प्रिय क्षण)
मेरे ही घर से मुझ को लेके जा रहा है तू
रखोगे ख्याल हरदम वादे भी कर रहा है तू।
जब तेरे घर में आकर हम हो गए तुम्हारे,
बदला मिज़ाज़ तेरा मुझको सता रहा है तू।
भूले वो अर्चनाएं , भूले वो सात फेरे .
प्रणय के इस अनुबंध को झूठा बता रहा है तू।
तेरे बदलते रूप का कारण समझ सके न हम,
गिरगिट सा रंग बदलकर खुद को छुपा रहा है तू।
अहसास को हमारे पलभर में रौंद डाला,
पत्थर बना के अब क्यों अरमां जगा रहा है तू।
डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved
8 Comments
January 15, 2008 at 5:37 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
स्वागत तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥
आगमन पर तेरे जन-जन के मन में हर्ष है।
सूर्य अपनी ऊष्मा धरती को है दे रहा
चांद अपनी चांदनी को नेह से भिगो रहा।
तारे सलाम कर रहे चहु ओर जैसे पर्व है,
स्वागत तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥
नेह का अनुबंध सृष्ठि का प्रथम अध्याय है,
इंसान की इंसानियत भी प्रेम का पर्याय है,
प्रेम से ही ज़िन्दगी है, प्रेम से उत्कर्ष है
स्वागत तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥
पर्वतों की अलसाई भोर चुपके से कुछ कह रही,
लग रहा ज्यों प्रकृति-दुल्हन अंगड़ाई ले उठ रही,
पवन करे अठखेलियां ज्यों रच रहा नवसर्ग है।
स्वागत तेरा नववर्ष है,स्वागत तेरा नववर्ष है॥
डा. रमा द्विवेदी
2 Comments
December 29, 2007 at 5:30 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
एक वर्ष भी बीत गया, नया वर्ष फिर आया है,
कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है।
कितने पल हमसे रूठ गए,कितनी विभूतियां खोई हैं,
कितने शूल चुभे अन्तस में,कितनी मालाएं पिरोई हैं,
मंदिर में कुछ पल बीत गए,श्मशान से कभी बुलावा है।
कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पया है॥
भावों के आलोड़न से मन-आंगन में रची रंगोली,
इक पल सेज सजी दुल्हन की,दूजे पल मेंहदी धो ली,
सुख-दु:ख के बैठ हिंडोले नियति ने क्रम दोहराया है।
कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है॥
जैसे भी कट गया सफर,क्या कल भी ऐसा कट पाएगा?
रिश्तों की बगिया में क्या फिरसे स्नेह सुमन खिल पाएगा?
फूल खिला जो डाली पर पतझड़ नें उसे मिटाया है।
कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है॥
नाहक झगड़ा करते हम,कुछ भी अपना नहीं यहां,
चन्द दिनों का अभिनय कर लें,क्या जाने कल कौन कहां?
सांसों की लय कब टूटेगी यह जान न कोई पाया है?
कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है॥
डा. रमा द्विवेदी
4 Comments
December 27, 2007 at 5:00 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
2 Comments
November 10, 2007 at 1:50 am (सृजन के प्रिय क्षण)
4 Comments
October 11, 2007 at 5:31 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
हम दिखाएंगे दुनिया को ऐसा समां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
दूरियां लाख हैं भी तो कुछ ग़म नहीं,
पास दिल के अगर हैं तो कुछ कम नहीं,
प्यार मिलता नहीं हैजहां में हर कहीं,
प्यार मिल जाए गर थाम लो तुम वहीं,
प्यास बुझती न हो प्यार का ज़ाम लो,
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो,
प्यार का हम बनाएंगे इक आशियां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
नफ़रतों की दीवारों को तोड़ेंगे हम,
जो हैं टूटे हुए दिल से जोड़ेंगे हम,
प्यार के वास्ते लैला-मजनूं मरे,
प्यार के वास्ते’ईसा’ सूली चढ़े,
प्यार मिल जाए गर तुम उसे थाम लो,
प्यार का ज़ाम लो,प्यार का ज़ाम लो,
प्यार में हम लुटा देंगे सब कुछ यहां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
जिनको है यहां दौलत का नशा,
जानते ही नहीं प्यार में क्या मज़ा,
प्यार बिकता नहीं है जहां में कहीं,
जो बिक जाता है प्यार है वो नहीं,
प्यार मिल जाए गर तुम उसे थाम लो.
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो,
प्यार में धड़कनें सदा रहतीं जवां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
प्यार की छांव में ज़िन्दगी यूं चले,
सीप के बीच में जैसे मोती पले,
प्यार में जो सुकूं है वो कहीं भी नहीं,
प्यार बसता जहां है जन्नत वहीं,
प्यास बुझती न हो प्यार का ज़ाम लो,
प्यार का नाम लो,प्यार का नाम लो
प्यार का हम बसाएंगे ऐसा जहां,
जहां मिलते हैं ये जमीं-आसमां।
डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved
4 Comments
September 22, 2007 at 10:16 am (सृजन के प्रिय क्षण)
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,
दूसरों को हंसने दें औ खुद भी मुस्कुराइए।
जल रही है धरती और जल रहा जहान है,
जल रहा है चप्पा-चप्पा,जल रहा आसमान है,
नफ़रतों को त्याग कर प्यार को अपनाइए…
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए।
तेरा -मेरा करके हमें कुछ नहीं मिल पाएगा,
मिल बांट्के खाएंगे गर स्वर्ग भी मिल जाएगा,
शिकवे-गिले छोड़कर अब तो मान जाइए….
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,
खाली हाथ आए हैं, खाली हाथ जाएंगे,
गर किए सत्कर्म तो साथ वो ही जाएंगे,
ज़िन्दगी है चार दिन कुछ पुण्य करके जाइए..
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,
पंच तत्व से बना मानव का शरीर है,
कर्ज़ है प्रकृति का तुझ पे फिर भी तू अधीर है,
ब्याज भी गर छोड़ दें मूल तो बचाइए….
ज़िन्दगी की क्यारी में इक पौधा तो लगाइए,
डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved
8 Comments
August 26, 2007 at 4:46 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
१- टेस्ट ट्यूब बेबी तो अभी जन्में हैं,
ये बनावटी लोग कहां से आते हैं।
बनावटी चेहरों की नकल करते-करते,
असली चेहरा ही भूल जाते हैं॥
२- चेहरे पर सच्चाई का नूर नहीं,
बेईमानी का लबादा है।
झूठ में रात-दिन गुजारते हैं,
पूरा करते नहीं अपना वादा है॥
३- क्या हुआ अगर हम आपके अज़ीज़ नहीं,
हम भी इंसान हैं हम दिल के गरीब नहीं।
इंसानियत अभी जिन्दा है,दिल की मरीज़ नहीं,
चलें सब साथ-साथ क्या कोई तरकीब नहीं?
४- छोटी सी ज़िन्दगी में झगड़ा है किस बात का?
प्यार से हम सब रहें संकल्प लें इस बात का।
बांट लें सुख-दु:ख सबके जीवन के दिन रात का,
क्यों नहीं जुड़ पाते हम प्रश्न है इस बात का?
डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved
6 Comments
August 16, 2007 at 12:29 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
हे मानव !
तुम वटवृक्ष मत बनो,
नई पौध को भी उगने दो,
माना कि तुम महान हो,
सुदृढ़ शक्तिमान हो,
इसलिए जमकर डटे हो,
नहीं फटकने देते किसी को,
इसलिए सदियों तक खड़े हो।
पूरी जीवन-ऊर्जा अगर तुम ही ले लोगे,
तो आस-पास के पौधों का क्या होगा?
मर जायेंगे वे असमय में ही,
वह भी तुम्हारे कारण ,
क्योंकि तुम्हारी छाया में,
कोई पौधा पनप नहीं सकता।
तुम्हारी महानता इसमें नहीं
कि तुम किसी को पनपने न दो,
तुम अगर छाया न भी दो,
तो कोई अन्य पेड़ छाया देगा,
किन्तु तुम्हारी तरह,
जीवन तो नहीं छीनेगा।
अच्छी तरह सोच लो,
अन्य पेड़ हैं इसलिए,
तुम्हारा अस्तित्व महान है।
लघुता न हो तो गुरुता का महत्व क्या?
रात न हो तो दिन का अस्तित्व क्या?
सबलता अगर किसी के काम न आए?
तो वह धरती पर बोझ बन जाती है,
और धरती भी उसके बोझ से,
मुक्त होना चाहती है।
( ’ Be Not a Banyan Tree ’ इस कविता का अनुवाद है)
डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved
6 Comments