क्षणिकाएँ

क्षणिकाएँ
१-   ज़िन्दगी की मंज़िलों के
रास्ते हैं अनगिनत,
शर्त है कि रास्ते,
खुद ही तलाशने पड़ते हैं।
२-   एक ही सूरज यहाँ भी,
एक ही सूरज वहाँ भी,
पर, एक साथ हर जगह,
सुबह नहीं होती।
३-   अधिकार मांगते हो?
ज़िन्दगी का अंतिम अधिकार,
मृत्यु के हाथ में ही,
सौंपना पड़ता है।
४-  ”मृत्यु” सच में अपनी है,
क्योंकि मृत्यु हमें,
ज़िन्दगी जीने का,
एक और,
भरपूर मौका देती है।

१-   ज़िन्दगी की मंज़िलों के
रास्ते हैं अनगिनत,
शर्त है कि रास्ते,
खुद ही तलाशने पड़ते हैं।
२-   एक ही सूरज यहाँ भी,
एक ही सूरज वहाँ भी,
पर, एक साथ हर जगह,
सुबह नहीं होती।
३-   अधिकार मांगते हो?
ज़िन्दगी का अंतिम अधिकार,
मृत्यु के हाथ में ही,
सौंपना पड़ता है।
४-  ”मृत्यु” सच में अपनी है,
क्योंकि मृत्यु हमें,
ज़िन्दगी जीने का,
एक और,
भरपूर मौका देती है।

डा. रमा द्विवेदी

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Published in: on September 28, 2009 at 10:30 pm Comments (3)
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क्षणिकाएँ

१- अपने घर की गली में
खेलते हुए हमारा बचपन
सुरक्षित तो था,
लेकिन आज वह गली भी
अपरिचित,दहशतभरी सी लगती है
कौन जाने? कब किसी की
लाश मिल जाए?

२- कभी अँधेरी गलियों से,
गुजरते हुए भय नहीं लगता था
किन्तु आज
रोशनी से नहाई
सड़कों से गुजरने में भी,
दहशत होती है।

३- एक समय था,जब
घर,खेत, पनघट
और गली में,
बनिताएँ सुरक्षित तो थीं,
किन्तु आज?
घर की पक्की चारदीवारी में भी
वे सुरक्षित कहाँ हैं?

डा.रमा द्विवेदी
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Published in: on January 6, 2009 at 9:49 pm Comments (4)
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