मुक्तक (हवा और आग)

-    हवाएं तन को सहलाती भी हैं,

        हवाएं तन को तपाती भी हैं।  

                     हवा जीवन का प्राण तत्व भी है, 

                     हवाएं जीवन को मिटाती भी हैं॥

             २-   आग मुर्दों को ही नहीं जलाती

                   वह जिन्दों को भी जला देती है। 

                   आग जंगल को ही नहीं जलाती, 

                   वह समुन्दर में भी आग लगा देती है॥

                      डा. रमा द्विवेदी

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Published in:  on October 9, 2008 at 10:37 pm Leave a Comment
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दो मुक्तक

    १-   जरा-मरण के बीच में
          दूरी है इक साँस की।
          साँस रुकी तो मृत्यु मिलेगी,
          मृत्यु रुकी तो ज़िन्दगी॥

   २-   ज़िन्दगी के रंगों में
          इक रंग मुझको भा गया।
          जीते-जीते ज़िन्दगी पर ,
          प्यार मुझको आ गया॥

       डा. रमा द्विवेदी
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Published in:  on April 13, 2008 at 5:53 pm Comments (3)
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धूप पर कुछ मुक्तक

धूप संग साया चला,
पर संग में कोई न था।
छांव के संग भीड थी,
पर संग में साया ना था॥

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धूप से ही हिम गला,
धूप से बादल बना।
धूप की ही तपिश से,
हिया धरती का दरक गया॥

*    *     *    *    *    *     

धूप की ही उष्णता में,
बीज भी अन्कुर बना।
धूप की मनमानी से,
अस्तित्व भी उसका मिटा॥

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धूप तडपाती भी है,
धूप तरसाती भी है।
शीत से अंग-अंग गले जब,
धूप सहलाती भी है॥

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ज़िन्दगी के मंच में,
व्यंग्यों की धूप तेज है।
मरहम लगा लगा हंसे,
शब्दों का हेर-फेर है॥

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धूप की विद्रूपता से,
खुद को बचाइयेगा आप।
वर्ना जल करके कहीं,
पा जाओ न कैन्सर का शाप॥

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धूप के इस खेल में,
कल की नहीं मुझको खबर।
आज है अस्तित्व मेरा ,
कहीं न जाऊं कल बिखर॥

 

डा. रमा द्विवेदी

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Published in:  on August 11, 2006 at 1:08 pm Leave a Comment
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