हँसी ओठों पे लाते हैं

किसी से क्या बताएँ कि क्या-क्या हम छुपाते हैं,
ज़माने को दिखाने को हँसी ओठों पे लाते हैं।

बने खुदगर्ज़ वे इतने उन्हें सब चाहिए लेकिन,
वफ़ा उनकी है बस इतनी कि बिन सावन रुलाते हैं।

फ़क़त उनके रिझाने को दिखाते नूर चेहरे पर,
कहीं वे रूठ न जाएँ ये गम हमको सताते हैं।

तृषा अपनी बुझाने को बढ़ाते तिश्नगी मेरी,
नहीं मिलता है स्वातिजल पिऊ-पिऊ रट लगाते हैं।

यही ख़्वाहिश रही दिल की अंजुरि में चाँद आ जाए,
निशा रोई है शबनम बन सुबह वे मुस्कराते हैं ।

डा.रमा द्विवेदी
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