Posted by: ramadwivedi | जुलाई 4, 2006

तलाश

वर्षों से तलाश थी जिसकी,
आज मैंने उसकी अनुभूति की,
प्रेम का स्वरूप कैसा होगा ,
कौन शब्दों में परिभाषित कर सकेगा?
क्या प्रेम गूंगा होता है?
हां येसा प्रेम मैंने देखा है एक रोज़,
चुप-चुप सा , गुमसुम सा,
पर हंसता -खिलखिलाता सा,
न वह कुछ कहता है?
न वह कुछ करता है ?
फिर भी उसका दावा है,
कि वह प्रेम करता है ।
प्रेम का कैसा यह अद्भुत रूप है?
प्रेम सच ह्रदय की अनुभूति है ।
आदमी इतना क्यों मजबूर है?
संबंधों के बोझ से क्यों चूर है?
कि प्रेम को भी खुलकर जी नहीं सकता,
जिसकी उसे तलाश है ।

 

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

 

 

१९८७ मे रचित रचना

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