Posted by: ramadwivedi | जुलाई 9, 2006

संवेदनाएं चुक गईं

 

संवेदनाएं चुक गईं,
अब और सह सकते नहीं ।
बन गया पत्थर दिल हमारा,
रहमोकरम तुम पे कर सकते नहीं ॥

 

कोशिशें तुमने बहुत कीं,
हमको मिटाने के लिए ।
जुल्म तुमने क्या- क्या किये?
हमें पत्थर बनाने के लिए ॥

 

हमारा दिल वो पत्थर है,
जो हर तूफ़ां को झेल जाता है ।
अंकित हो जाती हर तस्वीर उस पर
फ़िर नहीं मिट पाता है ॥

 

शायद तुम्हें मालूम न हो,
पत्थर का निशान होता है अमिट।
सदियों बाद पढ. सकते हैं उसे,
उसका इतिहास होता है अमिट ॥

 

तुमने जो विष बीज बोया है,
कई पीढियां मूल्य चुकाएंगी।
अब भी नहीं संभलोगे गर,
कायर तुम्हें बतलाएंगी ॥

 

तुमने रचा इतिहास जो,
कैसे बदल अब पाओगे ?
सदियों के इस पाप को,
किस पुण्य से धो पाओगे?

 

तुम करोगे जुल्म हम सहते रहेंगे-
वक्त वो जाता रहा ।
अब हम कहेंगे तुम सुनोगे,
वक्त ऎसा आ गया ॥

 

चाहे जितना आजमां लो,
देखेंगे कितना जोर तुम में है?
मोड. देंगे रुख हवा का,
हौसला इतना अभी भी हम में है ॥

 

डा.रमा द्विवेदी

 © All Rights Reserved

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Responses

  1. वाह किया बात है

  2. …अपनी मानसिकता बदलनी है,
    भूलों की गुठली उगलनी है॥
    बिना उसके किसका अस्तित्व है?
    बिना उसके किसका व्यक्तित्व है?
    -प्रेमलता


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