Posted by: ramadwivedi | जुलाई 29, 2006

हरियाली हर ले जाते हो

तुझमें मुझमें बस इक अन्तर,
तुम नर हो अरू मैं नारी हूं।
देती हूं जन्म मैं जीवन को ,
तुम जीवन को ठुकराते हो ॥

संबंधों का मैं संबल बनती,
अरू प्रेम की ज्योति जगाती हूं।
करती प्रयास मंगल का मैं,
तुम नफ़रत को फैलाते हो ॥

मैं फूलों की कोमलता हूं,
तुम मधुकर कठोर बन आते हो।
ले करके रस सब फूलों का ,
अन्यत्र खोज में जाते हो॥

करती हूं प्रतीक्षा सदियों तक,
तुम पलभर में घबराते हो ।
रहती हूं मौन त्याग करके,
तुम पल-पल हमें जताते हो॥

खोने का डर तो तुमको है,
इसलिए झपट सब लेते हो ।
कहने को कुछ नहीं पास मगर,
इतिहास नया रच जाते हैं॥

सरिता सलिला सी बहती हम,
सिंचित करती हैं जीवन को।
तुम रहते स्थिर एक जगह ,
कूलों सा कठोर बन जाते हो॥

वन-उपवन की सुन्दरता हम,
तुम पतझड. बन कर आते हो।
करते हो तांडव न्रत्य तुम्हीं,
हरियाली हर ले जाते हो ॥

संघर्षों में जी लेते हम,
तुम सुख को गले लगाते हो।
करते हो सुख परिवर्तन भी,
बादल बन उड.-उड. जाते हो॥

डा.रमा द्विवेदी

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Responses

  1. बहुत खूब भाई


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