Posted by: ramadwivedi | अगस्त 11, 2006

कुछ पल ठहर

यॊवन की ऎसी आई लहर,
मन तेरा जाए मचल-मचल।
मतवाली नदी सी दौड. रही,
रुकती नहीं है कहीं एक पहर॥

हिरनी सी कुलाचें मार रही,
दुनिया की तुझको नहीं खबर।
चुनरी तेरी जाए ढुलक-ढुलक,
लग जाय कहीं न किसी की नज़र॥

यॊवन तेरा गया निखर-निखर,
सजने लगी है तू पहर-पहर।
बांध के पांवों में पायल,
जायेगी अब तू बता किधर॥

गली गली और नगर- नगर,
ढूढ. रही तुझे कोई नज़र।
कुछ पल और तू जरा ठहर,
भूल न जाओ कहीं डगर॥

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

(कादम्बिनी में पुरस्क्रित रचना )

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Responses

  1. बढियां है, बधाई.


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