Posted by: ramadwivedi | अक्टूबर 5, 2006

पुनर्विवाह दंश (कहानी)

पुनर्विवाह दंश (कहानी)

लेखिका: डा. रमा द्विवेदी

छोटे से गांव में जन्मी पूर्नियां का विवाह नौ वर्ष की अवस्था मेंसतरह वर्षीय भगवानदस के साथ संपन्न हुआ था।पूर्नियां तो बस गहने-कपडे पाकर ही खुश थी।उस समय उसे विवाह का अर्थ भी मालूम न था । अपने नन्हें दोस्तों को अपने गहनें-कपडे दिखा कर वह बहुत खुश हो रही थी,जैसे उसे कोई अमूल्य निधि मिल गई हो। अल्पायु पूर्नियां को ससुराल नहीं भेजा गया।बारात वापस चली गई।
समय के जैसे पंख लग गए देखते ही देखतेपूर्नियां तेरहवें वर्ष में प्रवेश कर गई।शुभ मुहूर्त में उसके ससुराल वाले उसे विदा करवा कर ले गए।अनेक रीतिरिवाजों के साथ पूर्नियां का स्वागत हुआ और वह क्षण भी आ गया जब डरी सहमी सी उसने पति के चरणों में समर्पण कर दिया। ज़िन्दगी की दिनचर्या सहज रूप से चल रही थी ।दो वर्ष होते- होते पूर्नियां एक पुत्र की मां भी बन गई ।मां बनकर वह बहुत खुश थी ।
अभी एक वर्ष भी नहीं बीता था कि भगवानदास को ऐसा ज्वर चढा. कि फिर उतरा ही नहें ।घरेलू उपचार करते रहे क्योंकि छोटे से गांव में अस्पताल या डाक्टर नहीं था। उचित चिकित्सा के अभाव मेंउनकी म्रत्यू हो गई। पूर्निया पर मुसीबतों का पहाड टूट पडा। वह कई दिनों तक रोती-विलखती रही किन्तु जो सच था वह बदल नहीं सकता था। पूर्निया एक ही जगह पडी रहती ,उसका शरीर मानों स्पन्दनरहित हो गया हो। उसकी यह दशा देखकर सब यही कहते-“बेचारी की उम्र ही क्या है?पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा?” लोगों के शब्द उसके ह्रदय को छलनी कर देते। दूसरी चिन्ता उसे खाए जा रही थी कि जब घरवालों को उसके दो माह के गर्भ के बारे में पता चलेगा तब वे उसके साथ कैसा सलूक करेंगे?
जैसे-तैसे दिन काटने लगी।अपने को उसने यह समझा कर संभाल लिया कि बेटे के लिए तो जीना ही पडेगा। सास बेटे की म्रित्यु का दोष उसपर डाल रात-दिन कोसती प्रताडित करती कुलच्छिनी डायन मेरे बेटे को खा गई।वह खून के घूंट पीकर रह जाती,कुछ न कहती। अधिक श्रम का काम उससे करवाया जाता। उसस्के नन्हे से बेटे को भी बिना दूध की बासी रोटी खाने को दी जाती। जी-तोड मेहनत के बावजूद भी उसे बचा-खुचा खाना ही दिया जाता। वह उसे ही अपने बच्चे को खिला कर खुद खाती और संतुष्ट हो जाती। उसके दुखों का अन्त यहीं हो जाता तो अच्छा होता किन्तु भाग्य को किसने देखा है?
उसकी सास बडी ही दुष्ट और कर्कशा स्त्री थी। विधवा थी,किसी का अंकुश उस पर नहीं था।दिन्प्रतिदिन वह उसपर जुल्म ढाने लगी। ऐसी ही कठिन परिस्थितियों में एक दिन उसने सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।सूतक में भी पुर्नियां की सही देखभाल नहीं हुई। सास को उसपर दया नहीं आईऔर उसका दुर्व्यवहार जारी रहा।
पुर्नियां की सहन शक्ति चुक गई थी।प्रतिदिन की कलह से तंग आकर उसने अपने पिता को बुला भेजा और अलग रहने की इच्छा प्रगट की।पिता ने पंचों को जमा करके पुर्नियां को जायदाद में हिस्सा देने की बात रखी किन्तु उसकी सास ने हिस्सा देने से साफ मना कर दिया। उसकी गांव में बडी धाक थी या यह कहिए कि पंच भी उसके खिलाफ नहीं जा सकते थे। बहुत समझाने पर एक कमरा और प्रतिदिन के हिसाब से एक सेर अनाज और एक कटोरी दाल्देने के लिए वह रजी हुई। इतने में दो बच्चओं क,पिता और खुद का खाना भी नहीं चलता था।फिर अन्य खर्च ? वह घर में रहकर लोगों का पीसना कूटना करके देने लगी। जैसे-तैसे दिन गुजरने लगे। बूढे पिता से बेटी का दुख देखा न गया ऊपर से सास आते जाते खरीखोटी सुना ही जाती।
एक दिन पिता ने कहा-“तुम मेरे साथ चलो,मैं वहीं तुम्हारा प्रबन्ध कर दूंगा”।
पूर्नियां के माता-पिता और भाईउसकी नि:संतान मैसी के घर रहते थे।मौसी का अलग रुत्बा था। उनकी बात और जबान अत्यधिक कटु थी। यहां आकर पूर्नियां को कुछ स्वतन्त्रता तो अवश्य मिल गई किन्तु मेहनत करके ही जीना था अत:वह अपने पडोसी शिवशंकर से एक छोटी सी कोठरी मांगकर एक छोटी सी दुकान खोल ली।कोसो चल कर सामान लाती और बेंचती।इस तरह कडी मेहनत करके अपने ब्च्चों की परवरिश करने लगी।
शिवशंकर स्वतन्त्रता सेनानी थे।कभी जेल जाते तो कभी छूट जाते इसलिए उम्र हो जाने पर भी कुंवारे थे।बचपन से ही वे पूर्नियां को चाहते थे। एक दिन जब वे जेल से छूट कर आए तो वे पुर्नियां के कष्टों को देख कर द्रवित हो गए। मन ही मन उन्होंने उसे अपनाने का संकल्प कर लिया।उसे अपने विश्वास में लेने का प्रयत्न करने लगे और पूर्नियां भीन जाने किस आकर्षण के वशीभूथोकर उनकी ओर खिंची चली गई और एक दिन मर्यादा की सीमाएं टूट गईं।
पूर्नियां चिन्तित रहने लगी कि अगर किसी को पता चलाकि वह गर्भवती हैतो उसके भाई-बाप उसे जिन्दा ही ज़मीन में गाड. देंगे। इसी चिन्ता में घुली जा रही थी कि उसके बच्चों राम और श्याम का क्या होगा? तभी एक दिन किसी ने उसकी मौसी को किसी ने बता दिया कि वह गर्भवती है। अब क्या था? क्षण भर में घर में भूचाल आ गया। उसके बडे भाई ने उसे बहुत मारा-पीटा और घर से निकाल दिया। बच्चे भी चीन लिए।वह अभी सोच ही रही थी कि वह क्या करे? कहीं जाकर मर जाए? या कहीं चली जाए?लेकिन कहां जाए?अपना कोईनहीं था?मरने की हिम्मत वह जुटा नहीम पा रही थी। तभी शिवशंकर वहां आएऔर उसे बाइज्जतपने घर ले गए और भगवान को साक्षी मान कर विवाह कर लिया।
पूर्नियां को इस विवाह से एक सुद्रुढ. सहारा तो मिल गया किन्तु मानसिक धरातल पर वह विक्षिप्त रहने लगी। समाज उसे हेय द्रिष्टी से देखता था। वह एक वर्ष तक नज़रबंद होकर रह गई। बच्चों की याद में वह छटपटाती और अपने आप को कोसती। इस गम ने उसे अनदर से तोण्ड दिया। अपना सारा आक्रोश वह शिवशंकर पर ही उतारती। वे सह लेते कि कभी तो घाव भर जाएंगे और यह नार्मल हो जाएगी।
शिवशंकर अक्सर राजनीति के कार्यों में उलझे रहते। समाज में उनका सम्मान था इसलिए समाज की उपेक्षा का दंश उन्हें नहीम झेलना पडा। सच तो यह था पूर्नियां को अपना कर उनमें कोइ हीन भावना भी नहीं आई थी लेकिन पूर्नियां स्त्री थी और मां भी। उसकी आन्तरिक कुढ.न और घुटन बढती ही गई।
एक दिन उसने एक पुत्र को जन्म दिया।शिवशंकर खुशी से फूले न समाए। पुत्र का नाम रखा उमाशंकर।पूर्नियां को इस पुत्र के जन्म पर खुशी कम उन बिछुडे पुत्रों का गम अधिक था।सबसे बडी विडम्बना यह थीकि वे सामने के घर में ही रहते थे। वह उन्हें देखने के लिए घंटों दरवाजे की ओट में खडी रहतीकिन्तु न जाने वे कहां छुप जाते कि दिखई ही न देते। यह दु:ख उसे घुन की तरह खाए जा रहा था। वह हमेशा यही सोचती उसने पुनर्विवाह क्यों किया?कैसे वह कलेजों के टुकडों को अलग कर सकी? उसे यह सुख भोगने का कोई हक नहीं ? उसकी इसी घुटन ने उसे मानसिक रूप से बिमार बना दिया।
धीरे-धीरे समाज से उसका संपर्क बढा। उसकी बचपन की एक सहेली थी’कमली’।उसके भी दो बच्चे थेऔर जवानी में ही वह विधवा हो गई थी किन्त माता-पिता की इक्लौती संतान होने के कारण सुखपूर्वक जीवन बिता रही थी। उसने दूसरी शादी तो नहीं की किन्तु अपनी आवश्यकताओंकी पूर्ति अन्य तरीकों से की और बहुत बदनाम भी हो गई। उसए देख कर पूर्नियां को कुछ संतोष होता कि उसने जो किया है,खुलेआम किया हैऔर एक ही व्यक्ति से किया हैकिन्तु उसका विवेक ज्यादा देर तक न रहता और भावना प्रबल हो जाती।
राम और श्याम किशोरावस्था में पहुंच गए। राम त्प शान्त प्रकित का था किन्तु श्याम मां के प्रति विद्रोही बन गया। वह मां को खुलेआम गालियां देता,घर में पत्थर फेंकता और तरह तरह से नुकसान पहुंचाने की योजनाएं बनाता। बेटे का विद्रोही रूप देखकर वह अन्दर से टूटती गई और सदैव स्वयं को ही दोषी पाती।
श्याम की शादी हो गई। विवाह के तीसरे वर्ष वह बेटे का पिता भी बन गया। अभी विवाह चार वर्ष पूरे भी नहीं हुए थे कि अचानक हार्ट-अटैक से श्याम की म्रित्यु हो गई। मां की ममता हाहाकार कर उठी। गिरती-पडती बेटे के पास पहुंची किन्तु बहू बहुत दुष्ट थी उसने उसे दरवाजे पर ही दुत्कार दिया। वह अपमानित होकर भी उनकी देहरी पर बैठकर रोती रही। सुबह बेटे की अर्थी उठते वह फूट-फूट कर रो पडी। बेटे के अंतिम दर्शन के लिए अर्थी के पास गई,लेकिन निर्दयी बहू ने उसे दूर ढकेल दिया। बेटे की म्रित्यु का गहरा आघात उसे पहुंचा। सामने जवान बहू और एक वर्ष का पोता? वह सोचती बहू का पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा? वह भी तो उसके साथ नहीं रहती।वह क्या करे? कैसे उसकी मदद करे?उसने पुनर्विवाह क्यों किया? उसे जीने का हक नहीं है।इतना बडा सदमा वह कैसे सह सकी? अनेकानेक ऐसे प्रश्न थे जो उसके मस्तिष्क को झंझोरते रहते। वह इन प्रश्नों से जूझती जिन्दा लाश की तरह रहने लगी।
इधर उमाशंकर की भी शादी हो गई। पूर्नियां के मन में एक कुंठा घर कर गई कि उसने पुनर्विवाह करके ठीक नहीं किया। इसी दर से वह अपनी बहू का अतिरिक्त ख्याल रखती किन्तु बहू थी दुष्ट। वह अपने पति से उनकी शिकायतें करके मां बेटे को लडवाती। इससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पडा और उसे पित्ताशय का कैंसर हो गया। शीघ्र ही इलाज के अभाव में शरीर जर्जर हो गया और एक दिन वह तमाम कष्टों एवं कुंठाओं से घिरी चिर निद्रा में लीन हो गई। उसके शान्त और सौम्य चेहरे को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह वह अपने जीवन के तमाम कष्टों से मुक्ति पा गई है।*********

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Responses

  1. AB SAMAJ KO BADALNA HOOGA

  2. SAHI KAHAA AAPNE,AB SAMAAJ KO BADALNAA HEE HOGAA…SADIYON PURANI SADEE-GALEE MAANYATAAON KO PARISHKRIT KARNA HOGA…..AABHAAR SAHIT….

  3. हमारे निर्मम और संकुचित विचारों में जकड़े हुए समाज का इस मार्मिक कहानी
    के पात्रों और घटनाओं द्वारा सजीव चित्रण किया है।
    ना जाने कब बदलेगा यह समाज!

  4. आदरणीय शर्मा जी,

    आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत हार्दिक आभार….


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