Posted by: ramadwivedi | फ़रवरी 17, 2007

हूक उठी दिल में कुछ ऐसी

हूक उठी दिल में कुछ ऐसी ,  दूर क्षितिज तक चलता जाऊं।।
उच्च  शैल आनंद शिखर तक , अविचल होकर बढ़ता जाऊं।। 

घनन घनन घन सघन गगन हो, दामिनी चमके दिग्दाहों से 
तरल तिमिर  ना रोक सकेगा , मुझ को मेरी इन राहों से
स्वच्छंद सुमन हों खिले जहां , गीत प्यार के गाता जाऊं।।

गरल जलद की झड़ी लगी हो , गूंज रहे हों सुर-श्मशान 
चिर-निद्रा का अट्टहास भी , गरज रहा हो प्रलय समान 
प्रलयंकारी अंधकार में, बन आलोक बिखरता जाऊं।।   

अरुण अधर, नयनों का जादू , विघ्न बने पथ में छल बनके      
छीन रहे विश्वास-अडिग को , मन की परवशता सी बन के                
बुद्धि-चेतना जागी क्षण में , छल-प्रपंच से बचता जाऊं ।।        
रास्ते में देखा तोः-                          
दूर नगर से इक कुटिया में ,  टूट रहा था जीवन-बंधन
जीर्ण-शीर्ण रोगी था पीड़ित;  मिटती सी रेखा सा जीवन     
जीवन के मिटते रंगों में ,  रंग खुशी के भरता जाऊ।।     

नि:स्वार्थ भाव से सेवा-रत, आनंद-शिखर बन जाता है    
जीवन के निर्जन उपवन में , स्वच्छंद सुमन खिल जाता है    

  जहां भूख से विकल दलित हो, दु:ख निवारण करता जाऊं ।। 

हूक उठी दिल में कुछ ऐसी,   अंधकार में चलता जाऊ।।                
उच्च शैल आनंद शिखर तक, अविचल होकर बढ़ता जाऊं।।               
महावीर शर्मा

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