Posted by: ramadwivedi | जुलाई 18, 2007

ललक शहर में शादी की

         बड़े पिता जी का पत्र आया था। पत्र में लिखा था कि संध्या बहुत चिड़चिड़ी हो गई है। बात-बात पर झगड़ा करती है। किसी से ठीक से बात ही नहीं करती। हर समय लड़ना-झगड़ना,रोना -धोना मानो यही उसकी दिनचर्या बन गई है।मैं बहुत दुखी हूं ,समझ में नहीं आ रहा कि इसके जीवन को ठीक से व्यवस्थित करने के लिए ऐसा क्या करूं कि वह बाकी का जीवन खुशी से गुजार सके। तुम ही कुछ उपाय बताओ। पत्र पढ़कर मैं सोच में डूब गई।

         मैं अतीत की अतल गहराईयों में झांकने लगी।तब मैंने पाया कि संध्या जब नौ बरस की थी तब बड़ी मां बहुत बीमार रहती थीं। दिन में कई-कई बार उन्हें हिस्टीरिया के दौरे पड़ते थे। गांव में डाक्टर तो थे नहीं हां जो भी नीम-हकीम दवा बताते की गई। एक दो बार शहर के डाक्टरों को भी बताया गया,उन्होंने कहा कि ज्यादा मानसिक तनाव की वजह से ऐसा होता है। इन्हें आराम की शख्त जरुरत है। समय समय पर चेक-अप के लिए लाएं और जो दवाई दी गई है उसे समय पर देते रहें और तनाव से दूर रखें। 

            घर पर कोई और औरत तो थी नहीं और बड़े पिता जी तो अक्सर खेती-बाड़ी के काम-काज और राजनीति में उलझे रहते।मां तो अक्सर बिस्तर पर पड़ी रहती किन्तु घर के काम-काज का भार नन्हीं सी जान संध्या पर आ पड़ा। खाना पकाना,बरतन धोना, और घर बुहारना इन्हीं सब कामों में दिन निकल जाता अत: संध्या की पढ़ाई बन्द हो गई। दुर्भाग्यवश संध्या पांचवीं तक भी न पढ़ सकी। वैसे भी गांव में प्राइमरी स्कूल ही था इसलिये ज्यादा पढ़ाई की तो संभावना भी नहीं थी। मां अपनी बीमारी से लाचार थी  और पिता जी जीवन की अन्य समस्याओं को सुलझाने में उलझे रहते। संध्या की पढ़ाई की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। बड़ी मां को सिर्फ अक्षर ज्ञान ही था अत: वे इतना ही सोच पाती थी कि पढ़ लिख कर नौकरी थोड़ी ही करनी है। घर का चौका-चूल्हा ही तो करना है इसलिये संध्या की पढ़ाई बंद होने का  उन्हें लेशमात्र भी दु:ख नहीं हुआ।
           “समय ढ़लता रहा और संध्या का कोमल बचपन चूल्हे की भेंट चढ़  गया। सपने जन्म ही न ले सके उड़ान भरनें की बात कौन कहे?”लेकिन सोलवां बसन्त पार करते-करते उसके दिल में यह बात अवश्य ही घर कर गई कि सुख तो अब शादी के बाद ही मिल सकता है,वो भी तब अगर शहर में शादी हुई तो? गांव में त्तो ऐसे ही काम करना पड़ेगा और उसका मन काम से ऊब चुका था। उसकी इस सोच में उसकी सहेली सुदामिनी की सलाह ने आग में घी का काम किया। जब बड़े पिता जी ने उसका रिश्ता एक अच्छे खाते -पीते घर में तै कर दिया किन्तु लड़के का रंग काला था। जब संध्या ने यह सुना तो उसने रो-रोकर घर भर दिया कि मैं काले लड़के से शादी नहीं करूंगी और मर जाने की धमकी दे डाली। आखिर में पिताजी ने रिश्ता तोड़ दिया। जब दूसरी बार पिताजी ने अच्छा लड़का और परिवार देखकर बात तै कर दी तब संध्या से अपने गांव की  एक लड़की ने जो उसी गांव में ब्याही थी,उसने कहा कि वह उसके घर दान लेने आया करेगी क्योंकि उसके होने वाले ससुराल के लोग उसके घर पूजा करवाने आते हैं बस इतनी बात संध्या को चुभ गई और उसने शादी करने से विद्रोह कर दिया। इसी बीच उसकी सहेली ने उसके मन में यह बात डाल दी कि गांव में कभी शादी मत करना जीवन भर ऐसे ही काम करना पड़ेगा। उसकी यह बात उसे बहुत ठीक लगी।

           अपनी इच्छा पूर्ति न होते देख उसने मां से दोटूक शब्दों में कहा”मां मैं शहर में शादी करूंगी चाहे वह कुली ही क्यों न हो” ?
 मां बेटी की यह बात सुनकर अवाक रह गई,उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ” उन्होंने कहा यह तू क्या कह रही है? तुझे कुछ होश है”?
 संध्या ने अपनी बात बड़े आत्म-विश्वास से दोहराई-” मैं गांव में शादी नहीं करूंगी अगर शादी करूंगी तो शहर में नहीं तो मैं आत्म हत्या कर लूंगी”।
           मां ने उसे बहुत समझाया-बुझाया लेकिन संध्या थी कि अपनी जिद पर अड़ी रही। मां अब क्या करती? बेटी पर तरस आया और उन्होंने  पिता जी से संध्या की सारी बात कह दी। पहले तो पिताजी बहुत नाराज हुए,कई दिन तक घर में तनाव रहा। बेटी को ऊंच-नीच सब प्रकार से समझाने की कोशिश की लेकिन संध्या टस से मस न हुई। आखिर में पिताजी ने लड़के वालों को मना कर दिया।
           कुछ ही समय बाद गांव के तिवारी जी की बेटी रन्नो की शादी हुई । बारात शहर से आई थी। संध्या भी इस शादी को देखने गई। सभी बाराती साफ़-सुथरे, सुन्दर वेशभूषा  में थे। बातचीत में तो शहर के लोग शिष्ट और चतुर होते ही हैं। संध्या ने देखा कि रन्नो की शादी में सुन्दर गहने एवं साड़ियां आईं हैं। दूल्हा भी बहुत सुन्दर और स्मार्ट है। बस यह सब देखकर उसकी इच्छा शहर में शादी करने की और भी दृढ़ हो गई।
              ज्यादा दुनिया तो देखी नहीं थी। छोटी सी बुद्धि में आगे  कुछ सोचने-समझने की शक्ति नहीं थी। संध्या गोरी, तीखे नाक-नक्श,छरहरा बदन,कुल मिलाकर उसकी आकर्षक छबि थी और देखने वाले भी सहज ही आकर्षित हो जाते। इसी विवाह में किसी ने संध्या को देखा। रूप-रंग पसंद आने के कारण रन्नो के घरवालों से पता करके रिश्ता लेकर पिताजी के पास आए। चूंकि रिश्ता रन्नो के ससुराल वालों के माध्यम से आया था इसलिए पिता जी को कोई शक नहीं हुआ। सीधे-सादे  पिता जी को क्या पता था कि इसमें कुछ छ्लावा भी हो सकता है फिर अपनी बेटी की इच्छा भी तो शहर में  शादी करने की थी इसलिए पिताजी ने ज्यादा छान-बीन नहीं की ।बस एक बार नागपुर जाकर लड़का और उसका घर देख आए। शहर के लोग ठहरे चालाक उन्होंने किसी और की दुकान को अपना कह कर बता दिया। पिता जी को सब ठीक लगा इसलिए सगुन देकर वापस आ गये।
          लड़के वालों ने सिर्फ एक ही महीने में शादी करने की बात रखी। शादी की तैयारियां शुरू हुईं और एक दिन संध्या की शादी बड़ी ही सादगी से संपन्न हो गई।” संध्या बहुत खुश थी कि उसकी सबसे बड़ी साध पूरी हो गई। उसका मन कल्पना लोक में विचरण कर रहा था”। आखिर में वो समय भी आ गया जब संध्या की विदाई मां-पिता जी ने बड़े ही भारी मन से कर दी। जब संध्या ससुराल पहुंची और देखा कि घर में ऐसा कुछ नहीं है जिसे देखकर खुश हुआ जा सके। संध्या को शीघ्र ही पता चल गया कि पति शराबी है और निठल्ला भी है।न कोई नौकरी न व्यापार । बस एक पुराना घर है जिसका एक पोरशन किराए पर है  उसी से बहुत मुश्किल से  घर चलता है। बूढ़ी मां और एक कुंवारी बहन शादी के योग्य है। तीन बहनों की शादी बहुत पैसों वालों के घर तब हो गई थी जब उनके पिता जी जिन्दा थे क्योंकि तब उनके पिताजी का अच्छा व्यापार था और अच्छा नाम भी था। उनके न रहने पर लड़के ने सब गंवा दिया शराब के नशे में। कितना ही अथाह धन क्यों न हो अगर खर्च ही खर्च किया जाय तो तिजोरी भी खाली हो जाती है।यही हाल यहां हुआ। कभी -कभी बहनें पैसों से इनकी मदद कर देतीं थीं लेकिन किसी की मदद से कब तक चल सकता था? तीनों  बहनों ने मिल कर छोटी बहन की शादी अच्छा घर-वर देख कर करवा दी किन्तु फिर इन लोगों की आर्थिक मदद करना बन्द कर दिया। पति के दुर्व्यवहार और कुछ काम न करने से संध्या बहुत दुखी रहने लगी। उस पर सास यह ताना देती कि उनका बेटा उसके आने से ही बिगड़ गया है। सास के ताने सुन-सुन कर संध्या यह सोचती कि जो कभी सुधरा ही नहीं था वह बिगड़ कैसे गया?इन्हें अपने बेटे के लक्षण मालूम थे फिर भी इन्होंने छलावे से झूठ बोल कर शादी करवा दी ।यह सोच कर वह बहुत दुखी और उदास रहने लगी कि वह और उसके माता-पिता बुरी तरह छले गए हैं।उसका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरने लगा। ऐसे ही करीब पांच वर्ष बीत गए लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया। किस मुंह से बताती क्योंकि वह खुद ही तो शहर में शादी करना चाहती थी। पहले ही उसने मां और पिता जी को बहुत कष्ट दिये हैं अब और नहीं देगी। शायद इसी लिए भगवान ने उसे सजा दी है जो ऐसा पति मिला,अब यही मेरा प्रारब्ध है। नियति को कौन टाल सकता है? अब मुझे इसी नर्क में जीना है अब मैं किसी को दुख नहीं दूंगी। दुख और संघर्षों का प्रभाव तो स्वास्थ्य पर निश्चित ही पड़ता है। संध्या के मलिन मुख और दुबले शरीर को देख कर मां-पिताजी समझ गए कि वह खुश नहीं है,कोई बड़ा गम है जो उसे अन्दर ही अन्दर  खाए जा रहा है? एक दिन पिता जी ने बड़े प्यार से उसे अपने पास बिठाकर अपनी कसम देकर पूछा “सच सच बताना कि तुम वहां खुश तो हो ना”? संध्या थोड़ी देर तो चुप रही,उसके मन में द्वन्द्व का तूफ़ान उठा कि बताए या नहीं ?लेकिन उसका दर्द भी असहनीय होता जा रहा था इसलिए यह सोचकर कि मां और पिता जी तो अपने हैं वे अवश्य उसका दर्द समझेंगे । वह कुछ कहना चाहती थी पर कंठ से शब्द नहीं फूट रहे थे। आखिर में दर्द आसुंओं में बह निकला। संध्या फफक-फफक कर रो पड़ी। पिता जी ने उसे प्यार से थपकियां देते हुए गले से लगा कर कहा”पगली इसमें रोने की क्या बात है? हम हैं ना तेरे दुख को समझने के लिए। संध्या ने आपबीती सब कुछ बता दिया। पिताजी और  मां अवाक रह गए। उन्हें लगा कि वे बुरी तरह ठगे गए हैं। मां-पिता जी का दुख संध्या से देखा नहीं गया और उसने कहा कि वे उसकी चिन्ता न करें ।वह कैसे भी  रह लेगी किन्तु कोई भी माता-पिता बेटी का दुख जानकर चुप  कैसे बैठे रह सकते हैं? पिताजी ने दमाद को समझाया-बुझाया लेकिन उसने उनकी एक बात न सुनी। शराब की बुरी लत जो पड़ चुकी थी जिसने उसकी बुद्धि को भी नष्ट कर दिया था। अंत में जब कोई समाधान न रहा तब हारकर पिताजी संध्या को हमेशा के लिए घर ले आए”।
           संध्या के सुनहरे सपने यथार्थ की धरती पर गिर कर चूर-चूर हो गए थे फिर भी उम्मीद की एक आस  लिए वह सुख की असीम  आकांक्षा लेकर जिए जा रही “।
            संध्या को वैवाहिक जीवन से कोई सुख मिला ही नहीं ऐसी स्थिति में उसका चिड़चिड़ा हो जाना स्वाभाविक ही था। वो भी तीन बच्चों के साथ जीवन की मुसीबतें कुछ कम नहीं थीं। मुझे संध्या पर बहुत तरस आता।
             मां-पिताजी भी बहुत दुखी रहते। बेटी को दुखी देखकर कौन मां-बाप खुश रह सकते हैं?
              मैंने बड़े पिताजी को पत्र में लिखा कि जो होना था  वो तो हो गया। संध्या को कोई छोटा बिजनेस करवा दें। इससे एक तो उसका मन लगा रहेगा और वह आर्थिक रूप से स्वावलंबी भी बन जाने से उसके हृदय का दर्द भी कुछ कम हो जाएगा। वह क्रोशिया वर्क और इम्ब्रायडरी वर्क में बहुत निपुण है क्यों नहीं  उसे  यह काम करने के लिए प्रोत्साहित करते? बाज़ार में इसकी मांग भी बहुत है। थोड़ी सी ट्रेनिंग लेकर वह यह काम शुरू कर सकती है। सरकार भी महिलाओं को बिजनेस शुरू करने के लिए बहुत कम सूद पर कर्ज़ देती है। आप उसे किसी न किसी काम में अवश्य लगाईए ,सब कुछ ठीक हो जाएगा। उसकी दोंनो लड़कियों और लड़के  को पढ़ाना भी बहुत जरूरी है ताकि भविष्य में वे कोई भी मुश्किल का सामना स्वयं करने में सक्षम बन सकें। इतना लिखकर मेरे मन को कुछ शान्ति मिली और मैं उसके सुखद भविष्य की कामना के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगी ।  *****

                    लेखिका: डा. रमा द्विवेदी

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Responses

  1. रमा जी, जीवन की सुबह में ही ऐसे ऐसे कष्ट संध्या को देखने पड रहे है. ऐसी तो ढेर सारी संध्यायें हैं. शहर का एक नाम मुम्बई भी है. जहाँ आँखों में रंगीन सपने लिए लड्किया घर द्वार त्याग कर ऐश्वर्या राय और रानी मुखर्जी बनने आती है और कुछ और बन जाती है. एक बार लड़का चाहे तो मुम्बई भाग कर आ और वापस जा भी सकता है और मुम्बई के रंगीन किस्से सुना सकता है. पर लड़की एक बार आई तो यही रहेगी और यही मरेगी. वापस नहीं जा सकती.

  2. कुछ हद तक तो यह हमारे भारतीय समाज की जटिल संरचना का नतीजा है और कुछ लोगों की अयाथार्थवादी सोच का. शहर का भ्रमजाल लड़कियों ही नहीं, तमाम लड़कों के लिए भी जानलेवा साबित हो रहा है.

  3. जो रास्ते हमने देखे नहीं होते उसकी मंजिल से भी हम बेखबर होते हैं…।काफी अच्छा लेख है…।

  4. डा. रमा द्विवेदीsaid….

    वसन्त आर्य जी,

    प्रथम तो ‘अनुभूति कलश’ में आपका स्वागत है…यह कहानी भाग कर शहर जाने की नहीं है…यह गांव की लड़की कहानी है जो बचपन से ही काम के बोझ से ऊब गई है इसलिये वो शहर में शादी करने के ख्वाब देखने लगती है..बस छोटे से सुख की चाह है उसकी..ज्यादा कुछ नहीं। मुंबई भागकर आने वाली लड़कियां बहुत महत्वाकांक्षी होती हैं….संध्या का सुख घर-परिवार से जुड़ा है…परिस्थितियों का भी इसमें बहुत बड़ा हाथ है….संध्या के सुख की चाह बहुत वाजिब है…आपके विचार जानकर अच्छा लगा..हार्दिक आभार..

  5. डा. रमा द्विवेदी said…

    इश्त देव जी,

    आपका यहां पर आना और प्रथम बार अपने विचार प्रेषित करना….बहुत अच्छा लगा…आपकी बात बहुत सही है कि शहर का जादू सर चढ़ कर बोल रहा है..और भोले-भाले गांव के नवयुवक और नवयुवतियों को गुमराह भी कर रहा है ….बहुत बहुत आभार सहित

  6. डा. रमा द्विवेदी said…

    दिव्याभ जी,

    आपकी बात सही है…नए रास्ते और नई मंज़िलों से हम अंजान होते हैं…पर चलने से पहले सोचने की विशेष जरूरत होती है…ताकि हम अनचाही परेशानियों से बच सकें….आभार सहित..

  7. रमा दी..संध्या की कहानी बहुत मर्मस्पर्शी है.मैं एक ऐसी बहन का भाई हूं जिसके पति को सैटल करने में पिताजी ने अपना समय,श्रम और पैसा सब बरबाद किया.वह व्यक्ति कभी अपनी अकर्मण्यता से बाहर नहीं आया.आख़िर बात तलाक़ तक आई..माँ-पिताजी ने सोचा था अब इसे निजात दिला दी उस आरामतलब पसंद आदमी से तो अपने तईं कुछ करेगी लेकिन वह अपने अभिभावकों को दु:ख देने और इल्ज़ाम लगाने के अलावा कुछ नहीं करती …माता-पिता को पहले घर-जवाई का संताप था अब ये लड़की सालती है.ज़्यादा पढी़ लिखी नहीं सो कुछ करना भी नहीं चाहती..मेरी उससे संवादहीनता है सो मै क्या नसीहत दूं उसे.मै अपनी दुनिया में मसरूफ़ हूँ.संध्या जैसे कर्मण्य आत्मा को सलाम!

  8. पहली बार आपकी पोस्ट को पढ़ रहे है। संध्या जैसी एक लडकी को हम भी जानते है जिसकी शादी दिल्ली मे हुई थी और कुछ सालों बाद तलाक हो गया था। पर अब वही लडकी बी .एड.करके स्कूल मे नौकरी कर रही है । और अपनी प्यारी सी बेटी के साथ अपने मायके मे रहती है।

  9. सुनील जी,

    आपकी स्थिति मैं अच्छी तरह समझ सकती हूं क्योंकि यह कहानी सत्य तथ्यों पर आधारित है बस कुछ नाम ही बदलें हैं।अन्य भाई-बहनों से संबंध खराब तो हो ही जाते हैं…पर मैंने इस स्थिति को उजागर नहीं किया जानबूझ कर । ऐसी अनेक लड़कियों की कहानी हैं…माता-पिता का कोई विशेष दोष नहीं होता,जो कमजोर है वे उसकी ही मदद करते हैं ।आप अपना दिल छोटा न करें..जैसा चल रहा है चलने दीजिए।यह भी कुछ पूर्व जन्म का हिसाब -किताब होगा जो हमें चुकाना पड़ रहा है…अपनों से मिला दर्द असहनीय तो होता ही है…लेकिन हम इसे बदल नहीं सकते…बस यही सोचकर आप खुश रहें….सादर…

  10. ममता जी,

    आपका प्रथम बार आना और इस कहानी की पुष्टि करना …अच्छा लगा…यह कहानी आज के युग में किसी एक तक सीमित नहीं है..स्थितियां-परिस्थितियां कुछ अलग हो सकती हैं लेकिन यह कहानी सार्वकालिक है..यह जानकर अच्छा लगा कि आप जिसे जानती हैं वह आज अपने पैरों पर खड़ी है।यही इस कहानी का उद्देश्य है…लड़कियों को स्वावलंबी बनना ही चाहिए..तभी वह हर स्थिति का सामना कर सकती है…माता-पिता को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए…आभार सहित..

  11. बहुत ही मार्मिक कहानी है। कहानीकार किसी समस्या को लेकर अंत में पाठक के सामने एक प्रश्न छोड़ जाते हैं।
    आपने एक ज्वलंत समस्या को अधूरा ना छोड़ कर समस्या का हल देकर
    लोगों के लिए सही रास्ता भी दिया है।
    बधाई स्वीकारें

  12. डा. रमा द्विवेदी said….

    आदरणीय शर्मा जी,

    आपको कहानी पसन्द आई…..हृदय से आभारी हूं…सादर….

  13. आपकी कहानी ने अंतर्मन को छू लिया। वैसे कहानियों का एक और कोना इस वैश्विक जाल में मौजूद है। तहलका की हिंदी वेबसाइट http://www.tehelkahindi.com पर सांचे मनके के नाम से। यहां पाठक दुनिया भर के दिग्गज साहित्यकारों की कालजयी कहानियां पढ़ सकते हैं। और अगर उनके पास भी कोई कालजयी कहानी का स्रोत मौजूद है तो उसे लिंक भी भेज सकते हैं।

  14. अतुल जी,

    आपको कहानी पसन्द आई मेरा श्रम सार्थक हो गया….आशा है भविष्य में भी आप अपने विचारों से अवगत कराते रहेंगे….हार्दिक आभार सहित…


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