Posted by: ramadwivedi | अगस्त 14, 2007

न जाने कैसी आज़ादी……?

स्वतन्त्रता दिवस के शुभ अवसर पर अपने काव्यसंग्रह ’दे दो आकाश’ से एक गीत प्रस्तुत कर रही हूं…..

                  
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
               सारे जहां में हो रही रुसवाई है।

                ’सारे जहां से अच्छा’ गाते रहे हैं हम,
               अतीत के गौरव को मिट्टी में मिलाई है..
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               दल बदल रहे हैं कुर्सी के वास्ते सब,
               निज स्वार्थ के लिए सब लड़ रहे लड़ाई है…
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               जाने कहां गए वे जो वतन पे जान देते थे,
               आज तो पद के लिए हो रही आपाधाई है…
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               गैरों के ज़ुल्म सहते, शिकवा न था किसी से,
               अपनों के ज़ुल्म देखकर, रूह थर्राई है….
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               अंधेरों से उजालों में खतरे का डर है ज्यादा,
               मंदिरों में भी ज़िन्दगी खून से नहाई है…
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               दहेज वास्ते बहुएं सताई जाती हैं,
               अपनों के द्वारा ही नारी गई जलाई है….
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               नारी पे ज़ुल्म करके, मर्दानगी दिखाते,
               किस धर्म ने यह क्रूरता सिखाई है?
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               आज़ाद देश में नारी पे ज़ुल्म होते क्यों?
               हमारे देश की यह कौन सी बड़ाई है?
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               गुजरात और कश्मीर में लाशें पटी हुई हैं,
               खुदा बचाओ अब जान पर बन आई है….
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

               चारो तरफ है दहशत, सुरक्षित नहीं कहीं?
               हत्यायें देख-देख ज़िन्दगी खुद पे लजाई है…
               न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

                   डा. रमा द्विवेदी
                   © All Rights Reserved

 

 

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Responses

  1. बस ऐसी ही आज़ादी हमने पाई है ।
    घुघूती बासूती

  2. बहुत मायूस मत होवें.

    हम आप मिलकर स्थितियाँ बेहतर बनायें.
    कुछ अच्छा भी हो रहा है.
    यह अलग बात है
    इनका अनुपात इतना कम है कि
    इन अराजकताओं के गहरे महासमुन्द्र में
    कहीं डूबा सा खो रहा है.

    –चिन्ता न करें, बेहतर परिवर्तन होगा.

    आपको स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाई एवं स्वतंत्रता दिवस की ६० वीं वर्षगाँठ पर हार्दिक अभिनन्दन.

  3. रमा जी
    आपके रचनाएं वाकई ऐसी हैं जिन्हें साहित्य कहा जा सकता है, मैने कई ऐसी
    रचनाएं इसमें देखीं हैं जो उच्च कोटि की और हृदयंगम हैं।
    दीपक भारतदीप

  4. घुघुतीजी, एवं समीर जी,

    आपके विचार जान कर उत्साहवर्द्धन हुआ है…आप सभी का स्वतन्त्रता दिवस के ६०वीं वर्षगाँठ के सुप्रभात में हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएं…..

  5. डा. रमा द्विवेदीsaid….

    दीपक जी,

    यह तो मेरी खुश किस्मत है कि आप मेरी रचनाओं को समझ सके …वर्ना लोग पूर्वाग्रह के कारण सिर्फ़ अपनों की रचनाओं को ही सराहते हैं….जो ठीक नहीं होता…..जब कभी आप जैसे सुधी पाठकों की निष्पक्ष प्रतिक्रिया पढ़ने को मिलती है तब सच में एक विशेष प्रकार की अनुभूति होती है एवं लेखनी को नई ऊर्जा नई स्फूर्ति प्राप्त होती है। भविष्य में भी अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराते रहियेगा…हार्दिक आभार सहित…


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