Posted by: ramadwivedi | अगस्त 26, 2008

स्त्री विमर्श की कविताएँ ’दे दो आकाश’—अशोक शुभदर्शी

’दे दो आकाश’ काव्य संग्रह की कविताएँ देवनदी की जलधाराओं जैसी कल-कल करती हुई बहती हैं। इस जलधारा में कोई डुबकी लगाकर तो देखे वह पवित्र होकर ही नहीं निकलेगा बल्कि एक नई ऊर्जा और नई चेतना लेकर भी निकलेगा। लगता है पुस्तक की कवयित्री पहले स्व्यं खूब इस जलधारा में गहराई तक डूबी, बार-बार डूबी, फिर इस धारा को सर्वसुलभ बनाने में सफल हुई। कविताओं के शब्दों में कवयित्री के मन के भाव
 उतर गए हैं, अकसर यह नहीं होता। अकसर यह हो जाता है कि कवि कहना कुछ चाहता है और उसके शब्द कुछ और कहते हैं। संग्रह की कविताएँ पढ़कर ऐसा लगता है कि कवयित्री हड़बड़ी में कभी नहीं रही है। कवयित्री ने शब्द-शब्द तौला है, अपने भाव को प्रकट करने लायक शब्दों की तलाश की है, फिर अपनी कविताओं में उन्हें स्थान दिया है। आजकल कवि जल्दी से जल्दी अपनी कविताएँ लेकर लोगों के पास आना चाहता है और आता
 है। इस हड़बड़ी में उसकी कविताएँ प्रौढ़ नहीं रहतीं। डॉ. रमा द्विवेदी की कविताएँ उनके अंतर्मन की पाकशाला में खूब पकी हैं।

काव्य-संग्रह में युगीन समस्याएँ उजागर हुई हैं। नारी की स्थिति पर कवयित्री का ध्यान अत्याधिक गया है। नारी चेतना को जरूरी ठहराती हुई कवयित्री नारी को उसी चेतना में ऊपर उठने का संदेश देती हैं – कोमलता को कमजोर समझता यह है तेरी नादानी/ आती है बाढ़ नदी में जब, जग को करती है पानी-पानी। नारीत्व कमजोरी नहीं है। नारीत्व शक्ति का सच्चा स्रोत है।

भारतीय संस्कृति में ही यह ऊर्जा विद्यामान है। इस ऊर्जा की पहचान कवयित्री को पूरी तरह हुई है। तभी तो कवयित्री कहती है – तू अपनी पहचान को विवशता का रूप न दे/ वर्ना नर भेड़िए तुझे समूचा ही निगल जाएँगे। नारी जागरण की समस्या पूर्व से ही भयावह और गंभीर है। आज की नारी कुछ-कुछ जागी भी है। उसने जगह-जगह अपनी पहचान बनाई है, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। नारी को पूर्णतः जागने
 की जरूरत है। नारी घर के दीपक की तरह है। नारी जागेगी तो घर रोशन होगा। नारी शिक्षा का अनुपात अभी भी कम है फिर कवयित्री की इच्छा नारी को सिर्फ साक्षर देखने की नहीं है वरन्‍ वे चाहती हैं कि आज की नारी पूर्ण सबल हो जाए। वह चाहती है कि आज की नारी पत्नी जरूर बने किंतु आश्रिता न बने –

न रहो कभी किसी की आश्रिता,
खुद बनकर स्वावलंबी बनो हर्षिता
हमें खुद अपना संबल बनना  है
हमें परजीवी लता नहीं बनना है॥

नारी को इतना साफ संदेश अन्यत्र दुर्लभ है। इस कार्य में कवयित्री इसलिए सफल हुई है क्योंकि वह स्वयं स्त्री है और स्त्री की समस्याओं को पुरुष रचनाकार की तुलना में ज्यादा समझती है।

वह कामना करती है कि प्रत्येक नारी अपने नारीत्व को शीर्ष तक पहुँचावे। उसे एक आकाश मिल जाए। काव्य-संग्रह का शीर्षक भी यही संदेश देता है। शीर्षक में नारीत्व के शिखर को छूने की अपेक्षा है। शीर्षक से कवयित्री की दूसरी अपेक्षा झलकती है कि कवयित्री अखंड शून्यता को प्राप्त करना चाहती है। अखंड शून्यता की प्राप्ति की प्रक्रिया स्त्री शक्‍ति का चरम स्थिति तक पहुँचना है। स्त्री
 शक्‍ति वेदना सहने की शक्‍ति है। अपनी ही आत्मा की खॊज में मन की निरंतर चलने वाली प्रार्थना है। कवयित्री शायद आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त करने के लिए व्यग्र है। काव्य संग्रह में संकलित दे दो आकाश कविता में कवयित्री कहती है –

राज मुबारक तुमको, ताज़ मुबारक तुमको,
बस चाहते हैं इतना, दे दो आकाश हमको।

वह प्रेम का अर्थ समझाती हुई कहती है –

प्रेम दिल की पुकार है
हृदय का विस्तार है।

कुल मिलाकर इनकी कविताओं में एक बात रेखांकित करने लायक है कि नारी को नारीत्व पर ही भरोसा करना चाहिए। उसी में ताकत है –

पुरुषों की पशुता को पराजित कर
स्वयं की महत्ता उद्‍घाटित कर।

यह विशिष्टता इनकी कविताओं में उभरी है इसलिए कवयित्री विशिष्ट हो गई है। नारी जागर्ण में कुछ नाम उदाहरण की तरह हैं जिनकी चर्चा वह करती है। वह दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सीता, सावित्री की तरह जगने के लिए कहती है तो आधुनिक युग में सोनिया गाँधी में वे त्याग के महान गुण देखती है।

जहाँ आज की कविताएँ बुद्धिविलास का एक अंग हो गई हैं, शिल्प और बिंब ढूँढने के प्रयास में वह अंधेरी गुफा में प्रवेश हुई दीखती है। इस फेर में ये कविताएँ आम लोगों से कटती जा रही हैं, वहीं  रमा द्विवेदी की कविताएँ सहज और सरल हैं। वे बातें साफ-साफ रखती हैं।

कवि निर्मल मिलिंद ने संग्रह के स्वर को स्पष्ट करते हुए लिखा है – “नारी चेतना और स्त्री का स्वाभीमान दे दो आकाश का मूल स्वर है, हालांकि पर्यावरण की चिंता से लेकर राष्ट्ररक्षा में तैनात सैनिकों के बलिदान के प्रति असीम निष्ठा तक कवयित्री का रचना संसार फैला हुआ है, तथापि मुझे लगता है कि प्रेम कवयित्री का सहज स्वभाव है और विद्रोह उसकी अस्मिता की जरूरत।”

प्रो. टी. मोहन सिंह के शब्दों में – “इस काव्य में कवयित्री की काव्य चेतना के दो तट दिखाई देते हैं। प्रथम तट नारी की मुक्ति चेतना से संपन्न है तो दूसरा तट लोकबोध संबंधी है।”

आचार्य शिवचंद्र शर्मा ने पुस्तक की मूलधारा को उद्‍घाटित करते हुए कहा है – “जीवन का बहुरंगी चित्रण होते हुए भी डॉ. द्विवेदी जी के गीतों में स्त्री वेदना विशेष रूप से मुखरित है।”

संग्रह मेम १०० कविताएँ संग्रहीत हैं। कविता, मुक्तक एवं गीत के संगम की छ्टा निराली है। छ्पाई साफ सुथरी और आवरण आकर्षक है।

 साभार  :  `भाषा’-जुलाई-अगस्त,२००६,

प्रकाशकीय कार्यालय: केंद्रीय हिंदी निदेशालय माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग,

मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार

 

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Responses

  1. अभी तक पढ़ा नहीa है………पढ़ने की इच्छा हो गयी है…….देखती हूं , कब संयोग बन पाता है।

  2. न रहो कभी किसी की आश्रिता,
    खुद बनकर स्वावलंबी बनो हर्षिता
    हमें खुद अपना संबल बनना है
    हमें परजीवी लता नहीं बनना है॥

    बहुत खुब लाईने हैं, और ऐसा ही होना चाहिये

  3. आभार इस प्रस्तुति के लिए.


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