Posted by: ramadwivedi | अक्टूबर 29, 2008

आंसू एक : अर्थ अनेक

अश्रु बहें तो कभी दु:ख का या कभी कमजोरी लाचारी के प्रतीक माने जाते हैं लेकिन कभी कभी खुशी के आधिक्य में भी आंसू छलक पड़ते हैं। उल्लेखनीय यह है कि दोंनो प्रकार के आंसुओं में जमींन -आसमान का अन्तर होता है । दु:ख में हृदय हाहाकार करके रोता है और खुशी में मन रोमांचित होने पर आंसू झर-झर झरते हैं। दोनों का स्त्रोत उद्गम तो आंख ही है, आंसू भी एक ही है फिर अर्थ और अहसास भिन्न-भिन्न कैसे बन जाते हैं?
अश्रु दर्द में भी न गिरें ऐसा बहुत कम होता है । अश्रु खुशी में हरदम गिरें ऐसा भी बहुत कम होता है । विचित्र स्थिति और विचित्र प्रश्न है। कभी -कभी आदमी दुर्धर कष्ट में या अपने किसी प्रिय के मृत्यु हो जाने पर भी नहीं रोता । ऐसा क्यों होता है? क्या आंसुओं की खुद्दारी है या उनकी निर्दयता, क्योंकि आंसू ही आंख को संवेदनशील रखते हैं। अगर “आंख का पानी सूख जाए” तब क्या व्यक्ति कुछ देख पाएगा नहीं ना”? पानी का कितना महत्व है यह तो आप समझ ही गए होगें । इसलिये ही शायद कवि रहीम ने लिखा था” रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी बिना न ऊबरे मोती मानुष चून।” पानी पर बहुत सारे मुहावरे भी हैं….”आंख का पानी ढलक जाना”,पानी पानी होना,पानीदार होना “इत्यादि। ये सब आंख के पानी की ओर ही संकेत कर रहे हैं । आंख के पानी यानि आंसू को “मोती” कहकर भी नवाज़ा गया है लेकिन क्या कोई इन मोतियों की कीमत समझ पाया है? हम इन्हें व्यर्थ गिराकर खो देते हैं लेकिन हम खोते कहां हैं? आंसू बहने से आंख स्वच्छ होकर और भी सुन्दर और संवेदनशील हो जाती है इसलिए कभी-कभी रोना भी जरूरी है । ऐसा भी कहा जाता है कि आंसुओं के बहने से हृदय का दर्द निकल जाता है और मन हल्का महसूस करता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब खुशी में आंसू बहते हैं तब खुशी बह नहीं जाती बल्कि उसकी अनुभूति और अधिक बढ़ जाती है । अजीब बात है आंख से बहने वाले आंसू के दो सर्वथा भिन्न अर्थ कैसे हो जाते हैं ? जो भी हो आंसुओं का कभी- कभी बहना आंखों के लिए लाभकारी है इसलिये जब रोने का दिल करे तब अवश्य रो लेना चाहिए ।

डा. रमा द्विवेदी

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Responses

  1. अच्छा लगा पढ़ना!!

  2. ‘आंसू’ का भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से विभिन्न स्थितियों मे
    सुंदर विश्लेषण किया है। हिंदी साहित्य में ऐसे लेखों की बहुत आवश्यकता है।

  3. आदरणीय शर्मा जी,

    लेख आपको अच्छा लगा श्रम सार्थक हो गया….हार्दिक आभार सहित…

  4. respected dr sahib
    I appreciate your excellence in giving an analytical account of tears.Yes why not one must cry sometime,but let me tell you how and when,
    if you cry for your miseries and losses cry in isolation,cause people will consider it your weakness and offend you even more,if you cry with compassion for a fellowmen suffering then cry publicly to generate support to sucor his pains and if you cry in ecstasy of pleasure share them with a likeminded friend of yours deriving equal pleasure with you.Regards
    Dr Vishwa Saxena


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