Posted by: ramadwivedi | नवम्बर 20, 2008

सवाल ही सवाल

क्या युग का यह कमाल है?
कि हर तरफ सवाल है।
सवाल के ज़वाब में,
सवाल ही सवाल हैं।

सवाल इक सुलझ गया,
सवाल इक उलझ गया,
सवाल इक अनबुझा,
सवाल इक मचल गया।

अन्तस के कुछ सवाल हैं,
कुछ बाहरी सवाल हैं,
संसार भर के हैं सवाल,
सवालों से बेहाल हैं।

मंदिर से भी सवाल हैं
मस्जिद से भी सवाल हैं,
सवाल है मधुशाला से ,
‘वंदे मातरम’ पर सवाल हैं।

रिश्तों में भी सवाल हैं,
मित्रों से भी सवाल हैं,
दिल के जो करीब है,
उससे भी तो सवाल हैं।

गणित लगा-लगा थका,
सवाल हल न हो सका,
सवाल के जंजाल से,
कोई भी न निकल सका।

सवालों का है सिलसिला,
सवालों का है जलजला,
चुप यहां कोई नहीं,
सवाल करता ही चला।

डा. रमा द्विवेदी

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Responses

  1. रिश्तों में भी सवाल हैं,
    मित्रों से भी सवाल हैं,
    दिल के जो करीब है,
    उससे भी तो सवाल हैं।

    और इनका जवाब कहीं नही मिलता ..आपका लिखा मुझे बहुत अच्छा लगता है ..

  2. बहुत अच्‍छा लिखा है। चतुर्दिक सवाल ही सवाल हैं और जवाब कहीं नहीं।

  3. रंजू जी,

    यह तो आपकी उदारता है कि आपको मेरी रचनाएं पसन्द आती हैं….हार्दिक आभार सहित..

    संगीता जी,

    आपका अनुभूति कलश में स्वागत है..आपका स्नेह भविष्य में भी मिलता रहे…यही कामना है….दिल से शुक्रिया…

    डा. रमा द्विवेदी

  4. गणित लगा-लगा थका,
    सवाल हल न हो सका,
    सवाल के जंजाल से,
    कोई भी न निकल सका।
    बहुत सच कहा आपने रमा जी…बेहतरीन रचना…वाह…
    नीरज

  5. sawalon ki uljhan bahut khubsurat bani hai badhai

  6. बहुत बढ़िया रही रचना!

  7. रमा जी, आपकी रचना भी कमाल है। सरल भाषा में गहन बातें लिखना आप से
    सीखें।


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