Posted by: ramadwivedi | जनवरी 6, 2009

क्षणिकाएँ

१- अपने घर की गली में
खेलते हुए हमारा बचपन
सुरक्षित तो था,
लेकिन आज वह गली भी
अपरिचित,दहशतभरी सी लगती है
कौन जाने? कब किसी की
लाश मिल जाए?

२- कभी अँधेरी गलियों से,
गुजरते हुए भय नहीं लगता था
किन्तु आज
रोशनी से नहाई
सड़कों से गुजरने में भी,
दहशत होती है।

३- एक समय था,जब
घर,खेत, पनघट
और गली में,
बनिताएँ सुरक्षित तो थीं,
किन्तु आज?
घर की पक्की चारदीवारी में भी
वे सुरक्षित कहाँ हैं?

डा.रमा द्विवेदी
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Responses

  1. Bahut Khoob ……….!!!

  2. बिल्कुल सच बात कही आपने

  3. aadarniye rama jee ,
    bahut achcha likha hain aapne

    saadar
    hemjyotsana

  4. लकी जी,विनय जी व हेमज्योत्सना जी,

    रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार!


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